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शोहरत इतनी बुरी चीज़ है कि वो अच्छाइयों से ज़्यादा बुराइयां उजागर कर देती है

साहित्य
                
                                                         
                            डॉ. राहत इंदौरी पिछली पांच दहाइयों से उर्दू-हिंदी दोनों ज़बानों के जानने वालों के बीच एक जैसे सुने जाने वाले और पढ़े जाने वाले शायर थे। राहत इंदौरी के बारे में 'थे' लिखते हुए कितना असहज महसूस कर रहा हूं, शब्दों में बयान करना मुश्किल है। इसका एक सबब यह है कि अचानक लिखते-पढ़ते, शेर सुनाते हुए चले जाना और दूसरा यह कि उनमें अभी कम से कम एक दहाई की शायरी और बची थी। यानी वो आने वाली एक दहाई तक कुछ न कुछ नई शायरी हम लोगों तक ज़रूर पहुंचाने वाले थे। 
                                                                 
                            
 

कम पढ़े-लिखे लोग राहत इंदौरी को मुशायरे का अयोध्या, गोधरा, सद्दाम, ओबामा जैसे करेक्टर्स पर शेर गढ़ कर सस्ती दाद लेने वाला मशहूर शायर मान लेते हैं। अस्ल में शोहरत इतनी बुरी चीज़ है कि वो अच्छाइयों से ज़्यादा बुराइयां उजागर कर देती है। यही सबब है कि चाहे अहमद फ़राज़ हों, बशीर बद्र हों या राहत इंदौरी हों, इनको सिर्फ़ मुशायरों का और शायरी की कम समझ रखने वाले लोगों का ही शायर समझ कर बात ख़त्म कर दी जाती है।

मगर हक़ीक़त में ऐसा है नहीं। मुशायरे होते रहते हैं, मुशायरों में शायरी होती रहती है। मुशायरे ख़त्म हो जाते हैं और मुशायरों के साथ-साथ जो सिर्फ़ मुशायरों की शायरी होती है, वो भी ख़त्म हो जाती है। लेकिन डॉ. राहत इंदौरी के कम से कम दो दर्जन अशआर फिज़ाओं में तैर रहे हैं और पिछली पांच दहाइयों से पीढ़ी दर पीढ़ी, दादी-नानी की कहानियों की तरह मुंतक़िल हो रहे हैं।
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2 वर्ष पहले

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