शब्दों और अलंकारों का अपार भंडार। भक्ति और रीति काल को आधुनिकतम रूपों में ढालने की महारथ। आवाज़ की वो ऊंचाई और गहराई जहां पहुंच पाना कम से कम आज के गायकों के लिए आसान नहीं। कैलाश खेर को जब भी आप सुनेंगे, एक अलग दुनिया में पहुंच जाएंगे। अपनी धुन का पक्का एक अकेला ऐसा शख्स जो आज अपने दम पर संगीत की दुनिया में वो मुकाम हासिल कर चुका है जिसकी मुरीद मैं ही नहीं पूरी दुनिया है। मुंबई के आराम नगर में कैलाश खेर के स्टूडियो ‘कैलासा’को बाहर से देखेंगे तो एक सामान्य सा घर दिखेगा.. लेकिन यहां जो संगीत बनता है उसे सुनकर आप यही कहेंगे... दीवानी...तेरी दीवानी....उनका बेहद आत्मीय और दोस्ताना अंदाज़ है। जब भी लोग उनसे मिलते हैं तो वह बिंदास होकर एक फक्कड़ भाव के साथ मिलते हैं। यही भाव उनके गीतों में नज़र आता है। कैलाश की यह सारी खासियत काफी है मुझे उनका मुरीद बनाने के लिए, ‘साहब’उनका तकियाकलाम है...जब बात शुरू करते हैं तो शब्दों का झरना बहने लगता है। उनका सूफ़ीवाद एक नए दर्शन के साथ आपके सामने होता है, जहां ईश्वर है, शिव हैं और वो मस्ती है जो कैलाश खेर को बाकी गायकों से अलग करती है।
कैलाश देश के कोने कोने से प्रतिभा को तलाशने में जुट गए हैं। दो नए बैंड बना रहे हैं। यह बैंड देश की संगीत प्रतिभा को एक बड़ा मंच देंगे। वह कहते हैं कि अब मेरा मकसद संगीत की उन छुपी हुई प्रतिभाओं को तलाशना है जिनपर किसी की निगाह नहीं जाती, जिन्हें मौका नहीं मिलता...वह कहते हैं कि मैं ये करके रहूंगा। क्योंकि मैं अड़ियल बैरागी हूं, ज़िद्दी अनुरागी हूं।
कैलाश खेर का परिवार, जीवन का संघर्ष, मां के साथ उनका लगाव, काम के प्रति गहरी लगन और निष्ठा की जितनी तारीफ की जाए कम है। एक ज़िद्दी, धुनी और जुनूनी कलाकार एक तरह से अपने आप में संगीत की एक संपूर्ण प्रयोगशाला है। गीत लिखने से लेकर उसे धुनों में बांधने तक, संगीत के आधुनिक और परंपरागत वाद्यों का अद्भुत तालमेल उनकी बेशकीमती प्रतिभा है। दमदार, ओजपूर्ण और बेहद गहरी आवाज़ का जादू कैलाश को अन्य गायकों से अलग करता है।
कैलाश को संगीत और गायिकी कश्मीरी मूल के पिता से विरासत में मिली।
कैलाश खेर PC: लस्सी विथ लावन्या
7 जुलाई 1973 को मेरठ में पैदा हुए लेकिन जल्दी ही परिवार दिल्ली आ गया। कैलाश को संगीत और गायिकी कश्मीरी मूल के पिता से विरासत में मिली। पिताजी अपनी बेहतरीन गायिकी की वजह से आसपास के लोगों में जाने जाते थे लेकिन संगीत प्रतिभा उन्हें पहचान नहीं दिला सकी। बेहद सामान्य और मध्यवर्गीय पारिवारिक परिवेश में पले बढ़े कैलाश में महज चार साल की उम्र से ही संगीत को लेकर ऐसी दीवानगी दिखने लगी कि अक्सर परिवार और दोस्तों के बीच अपनी दमदार आवाज़ में गीत सुनाने लगे। 13 साल के हुए तो घर छोड़कर किसी गुरु की तलाश में भटकने लगे। मां को याद करते हुए कैलाश भावुक होते हैं और बताते हैं.. ‘मां कहती थी कि मर जाएगा, घर छोड़कर मत जा, फिर कहतीं कि मां के हाथ का गाजर का हलवा तुझे कितना पसंद है, बाहर नहीं मिलेगा... बहुत रोका, लालच दिया, गुस्सा किया लेकिन बाद में मेरी ज़िद के आगे बेबस हो गईं.. कहने लगीं ठीक है जा, लेकिन कुछ बनकर दिखाना वरना वापस मत आना।
बकौल कैलाश वो दिन है और आज का दिन है, मैंने मीठा खाना छोड़ दिया, खट्टा और ठंडा नहीं खाता और ऊपर वाले के आशीर्वाद से आज इस मुकाम तक पहुंचा हूं। आज भले ही कैलाश खेर इस मुकाम पर हैं लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए 2001 में मुंबई आने के बाद से उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। एक डायमंड कंपनी के लिए उन्होंने जिंगल गाए फिर कुछ और विज्ञापनों में आवाज़ दी लेकिन इनकी आवाज़ के सूफ़ियाना अंदाज़ और दमदार आरोह अवरोह ने सबका ध्यान खींचा, कैलाश खेर में नुसरत फ़तेह अली खां जैसी आवाज़ का जादू नज़र आने लगा और उन्हें सबसे कामयाब मौका मिला 2004 में आई फिल्म ‘वैसा भीहोता है’में। इस फिल्म का गीत ‘अल्लाह के बंदे हंस दे..’इतना मशहूर हुआ कि कैलाश खेर घर घर में पहचाने जाने लगे।
शिव के अनन्य भक्त कैलाश खेर इसे ऊपरवाले की मेहरबानी मानते हैं और बताते हैं कि कैसे एक पर एक उनके भीतर से शब्द फूटने लगे, गीत बनने लगे और धुन बनाने के साथ वो अपने गीतों को मौसीकी में ढालने लगे। उन्हें न तो गीत लिखने के लिए किसी एकांत पहाड़ी की जगह या कॉटेज चाहिए, न कोई लोकेशन और न ही कोई तामझाम। वो बताते हैं कि कैसे तनाव के क्षणों में भी उनके भीतर का संगीत फूटता है और कैसे शब्द बनते और तरन्नुम में आते चले
जाते हैं, जो आमतौर पर फिल्मों में इस्तेमाल करने से लोग डरते हैं। कैलाश दावा करते हैं कि वो जो लिखते हैं…परंपरा, अध्यात्म, आत्मा और संस्कृति से जुड़े हिन्दी के जो शब्द बनते हैं, वही उनकी अमूल्य पूंजी हैं। वही उनकी पहचान हैं और इन शब्दों की ताकत का ही असर है जो उनके गीतों में, लय में और रागों में इतनी ताकत और ऊर्जा पैदा हो जाती है।
कैलाश खेर ने योग दिवस पर योगगुरू रामदेव को 'बम लहरी' की अपनी धुन पर पूरी ताकत से नाचने को मजबूर कर दिया था। अमेरिका में प्रधानमंत्री मोदी के लिए मोदी-मोदी की धुन गाकर लोगों में जोश भर दिया था। कैलाश कहते हैं कि बाबा रामदेव को वह राजनैतिक नहीं मानते, बल्कि वह उन्हें योग गुरु मानते हैं, उन्हें आध्यात्मिक मानते हैं। लोगों में स्वास्थ को लेकर चेतना जगाने पर वह बाबा रामदेव की प्रशंसा भी करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी पर वह कहते हैं कि अपने प्रधानमंत्री की पूरी दुनिया में बेहतरीन छवि है। पीएम मोदी के व्यक्तित्व की जो धूम है, ये उनके लिए गर्व की बात है। वैसे पीएम मोदी भी कैलाश खेर को पसंद करते हैं। वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को भी कैलाश खेर पसंद हैं। इस पर कैलाश का कहना है कि ‘जी देखिए, हम तो प्रोफेशनल कलाकार हैं। हमसे जो कहता है, इज़्जत के साथ बुलाता है, हम उसके पास चले जाते हैं। जैसे अखबार वाले सबका विज्ञापन छापते हैं, सबको स्पेस देते हैं। हम भी वही करते हैं। वो हमें एजेंसी के ज़रिए बुलाते हैं। फिर आप जब इस मुकाम पर आ जाते हैं तो पैसा भी मैटर नहीं करता, संबंध, रिश्ते, विचार मैटर करता है। अगर कोई सीधा फोन कर दे तो नखरे तो दिखा नहीं सकते। कैलाश कहते हैं कि कलाकारों को किसी एक नहीं होना चाहिए...ब्रांडेड तो कभी नहीं होना चाहिए।
फिर भी मैं चुपचाप छत पर गया, अपने शिवशंकर का ध्यान लगाया...
कैलाश खेर PC: इंडिया डॉट काम
एक वाकया सुनाते हैं कैलाश खेर। एक डेढ़ साल पहले उनके स्टूडियो कैलासा के बाहर बीएमसी ने नोटिस चिपका दिया कि अब इसे गिरा दिया जाएगा। दरअसल पहले की बनी इस इमारत की दीवारें जर्ज़र थीं, छत से पानी बहता था और मुंबई की भयानक बारिश में तो पूछिए मत, यहां का हाल क्या होता था। विदेशों से मंगवाए गए इतने महंगे संगीत के इंस्ट्रूमेंट्स थे, ऐसे में यहां मरम्मत का काम करवाने लगे तो बीएमसी वालों का फरमान आ गया।‘सोचिए मेरी क्या स्थिति रही होगी। फिर भी मैं चुपचाप छत पर गया, अपने शिवशंकर का ध्यान लगाया और फिर जो शब्द फूटे-पद्मासन में ध्यान लगाए मौन है... वीराने में तपता योगी कौन है...हर हर शिवशंभु...जय जय केदारा...ऐसे ऐसे शब्द मिले और जो गीत बना...आप सुनिए... शिव के इस गीत को अमिताभ बच्चन समेत अरिजीत सिंह, सोनू निगम, शान, शंकर महादेवन, अभिजीत, श्रेया घोषाल, अनूप जलोटा, हेमा मालिनी जैसी देश की जानी मानी 15 हस्तियों ने जब गाया तो लगा जैसे केदारनाथ के प्रलयंकारी भगवान शिव धरती पर उतर आए हों। ‘दरअसल ये गीत तैयार हुआ एक आने वाले टीवी सीरियल बाबा केदार के लिए जो उत्तराखंड सरकार की मदद से और केदारनाथ यात्रियों में नई ऊर्जा भरने के लिए बनाया जा रहा है।
कैलाश कहते हैं कि फिल्मों में गाने के अलावा लाइव प्रोग्राम में गाने की बात ही कुछ और है। वहां आपका असली इम्तिहान होता है। उनके अनुसार यहां कोई रीटेक नहीं होता। पब्लिक राम होती है.. हज़ारों आंखें टार्च की तरह आपको देख रही होती हैं। लोग आपके एक एक शब्द, एक एक धुन को सीधा और आंखों में आंखें डाले सुनते हैं। आपने एक गलती की तो लोग कहेंगे कि ये तो बस ऐसे ही है...कोई कच्चा फल आया है। आज सबके लिए समय बहुत कीमती है...लोग अपने दो घंटे खर्च करके आपको सुनने आते हैं...ऐसे में आपके लिए बड़ी चुनौती होती है। अल्बम या अपना लिखा गाने का अलग मज़ा है, अपने तरीके से अपने अंदाज़ में गा सकते हैं, तमाम प्रयोग कर सकते हैं। ऐसा समझिए.. कि फिल्म जो है एक नहर है, अल्बम नदी है और लाइव परफॉरमेंस जो है वो सागर है...
कैलाश कहते हैं कि सामाजिक बदलाव लाने में संगीत की बेहद अहम भूमिका है। गायकों और कलाकारों का खास योगदान है। बातों और नारों से जो काम नहीं हो सकता है वो संगीत से हो सकता है। इसकी अपील बहुत गहरी है। आप देखिए, स्वच्छ भारत अभियान हो या देश की सीमाओं की रक्षा का सवाल, देशप्रेम का जज़्बा हो या फिर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुहिम, संगीत जितना असर डालता है, वो कुछ और डाल ही नहीं सकता। कला और संगीत की अपनी भाषा होती है जो बहुत गहराई तक आपके मन में उतर जाती है।
‘बम लहरी..’पर कैलाश काफी उत्साहित हैं। कहते हैं कि लोग क्लबों में शराब छोड़कर शिव के इस गीत पर झूम उठते हैं। वो कहते हैं कि पाकिस्तान में जब उन्होंने ‘बम लहरी’ गाया तो क्लब में वहां के तमाम युवा पागल हो गए... शिव का नाम आते ही शराब के प्याले रख दिए जाते हैं और लोग इसके साथ झूमने लगते हैं। कैलाश के अनुसार हम सभी अपने अपने तरीके से लोगों के लिए ही काम करते हैं, संगीत और कला के ज़रिए सामाजिक संदेश देते ही हैं। हां ये ज़रूर है कि जो कलाकार भगवान की दुआ से इतनी शोहरत पा चुके हैं, मशहूर हो चुके हैं, जिनके करोड़ों चाहने वाले हैं, उनकी बातों का असर होता है। मेरा मानना है कि ऐसे लोगों को संसद और सरकार के साथ जुड़ना चाहिए, उन कार्यक्रमों और संदेशों को अपने चाहने वालों तक पहुंचाना चाहिए, इसका बहुत ज्यादा असर होगा।
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कैलाश को संगीत और गायिकी कश्मीरी मूल के पिता से विरासत में मिली।
9 वर्ष पहले
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