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आजादी...हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए...

अमर जवान ज्योति
                
                                                         
                            यूनानो-मिस्र-रोमां सब मिट गए जहाँ से 
                                                                 
                            
अब तक मगर है बाकी नामो निशां हमारा 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी 
सदियों रहा है  दुश्मन दौरे जमां हमारा 
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा। 


एक ख़ूबसूरत हिंदुस्तान की परिकल्पना, आज़ाद हिंदुस्तान, स्वतंत्र भारत की सोच, ख़ुद का तंत्र स्थापित करने की ज़िद, आज़ाद देश में सांस लेने की भावना, अभिव्यक्ति की आज़ादी, एक स्वतंत्र राष्ट्र का नागरिक बनने का सम्मान अपने आने वाली पीढ़ी को देना। कुछ ऐसे ही बातें थी, ऐसे ही सपने थे, ऐसे ही ख़ूबसूरत ख़्यालात थे, जो पूरा हो रहा था 15 अगस्त 1947 को। 

जब रात की कालिमा सूर्योदय से पहले आकाश में लालिमा में तब्दील होती है, तब जाकर सूर्य आकाश में चमकता है। कुछ ऐसा ही हुआ था 15 अगस्त 1947 को। संवैधानिक तौर पर राष्ट्र के रूप में मान्यता तो 26 जनवरी 1950 को मिली लेकिन स्वतंत्र राष्ट्र का उदय अपनी लालिमा के साथ हुआ 15 अगस्त 1947 को। यह वही दिन है जब सालों पुरानी ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर हम आज़ाद देश के आज़ाद नागरिक कहलाने का हक़ पा रहे थे। 

15 अगस्त 1947 भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम पन्ना है, हमारे भारत के मनीषियों का संजोया सपना साकार हो रहा था, आज़ादी की खुली हवा में हम सांस ले रहे थे, अंग्रेजों के दमन का भय नहीं सता रहा था, निडर होकर भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारों से सारा आकाश गूंज रहा था। आज ही के दिन हमारा विजयी विश्व तिरंगा लहराया था, बिना किसी बंदिश के और हम गर्व से लहराते तिरंगे से आकाश का अभिषेक कर रहे थे। 

कवि सुमित्रानंदन पंत की इन पंक्तियों इस एहसास को बयां करती हैं, 

चिर प्रणम्य वह पुण्य अह्न जन गाओ सुरगण। 
आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! 
नवभारत फिर चीर युगों का तिमिर आवरण 
तरुण अरुण सा उदित हुआ परिदिप्त कर भुवन 
सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन 
आज खुले भारत के संग भू के जड़ बंधन 
शांत हुआ अब युग-युग का भौतिक सघंर्षण 
मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण 

 

परिवर्तन की ज़िम्मेदारी हम युवाओं को उठानी होगी

आज़ादी मिले 70 साल गुज़र चुके हैं। आज हमें अपनी आज़ादी के मूल्य को समझना है। हमें इसका मूल्यांकन करना है कि कहीं हम में वह एहसास कमज़ोर तो नहीं हुआ जो सपने देखे थे, जो रूपरेखा तैयार की थी। हम कितने सफल हुए हमें ख़ुद ही आँकना है। इन गुज़रे 70 सालों में हमने कई सफलताएँ हासिल की और अनेक क्षेत्र में कई उपलब्धियां गिनाई। चाहे दूरसंचार का क्षेत्र हो या सूचना प्रौद्योगिकी का क्षेत्र, अंतरिक्ष की बात हो या शिक्षण का क्षेत्र हो, हमने काफी तरक्की की है। चंद्रयान-1 , मंगलयान, लड़ाकू विमान, नाभिकीय हथियार ये तमाम चीज़े हमारी उन्नति का परिचायक है। कवि हरिऔन्ध की लिखी कविता यही बताती है, 

चिलचिलाती धूप को जो देवें चांदनी बना।
काम पड़ने पर जो करें शेर का भी सामना।
जो कि हँस हँस के चबा लेते है लोहे का चना
है कठिन कुछ भी नहीं जिनके है जी में यह         
ठना
कोस कितने ही चले पर वे कभी थकते नहीं
कौन सी है गाँठ जिसको खोल वो रुकते नहीं। 

पर्वतों को काटकर सड़कें बना देते हैं वे
सैकड़ों मरुभूमि में नदियां बहा देते हैं वे
गर्भ में जल राशि के बेड़ा चला देते हैं वे
जंगलों में भी महामंगल रचा देते हैं वे
भेद नभ तल का उन्होंने है बहुत बतला दिया
है उन्होंने ही निकाली तार तार सारी क्रिया। 


 
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परिवर्तन की ज़िम्मेदारी हम युवाओं को उठानी होगी

8 वर्ष पहले

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