जब कलम की तासीर को संगीत की तरंगों के साथ परोसा जाता है तब उसका स्वाद चखने वाले कान उसे मस्तिष्क से प्रवाहित कर सीधा दिल में उतार देते हैं, इसमें भी कुछ ही विरले वह गीत होते हैं जो सदियों तक याद रह जाते हैं और गुनगुनाए जाते हैं। पेश हैं हिन्दी सिनेमा के ऐसे ही कुछ गीत और उनके गीतकार जिन्होंने लोगों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी।
आनंद बक्षी
फ़िल्म: हिमालय की गोद में गायक/गायिका: मुकेश संगीतकार: कल्याणजी-आनंदजी गीतकार: आनंद बख्शी
चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था
हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था
ना रस्में हैं ना कसमें हैं
ना शिकवे हैं ना वादे हैं
इक सूरत भोली भाली है
दो नैना सीधे सादे हैं – 2
ऐसा ही रूप खयालों में था
जैसा मैंने सोचा था, हाँ…
मेरी खुशियाँ ही ना बाँटे
मेरे ग़म भी सहना चाहे
देखे ना ख्वाब वो महलों के
मेरे दिल में रहना चाहे
इस दुनिया में कौन था ऐसा
जैसा मैंने सोचा था, हाँ…
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिये
तू अब से पहले सितारों में बस रही थी कहीं
तुझे ज़मीं पे बुलाया गया है मेरे लिये
कभी कभी मेरे दिल में...
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के ये बदन, ये निगाहें मेरी अमानत हैं
ये गेसुओं की घनी छाँव है मेरी ख़ातिर
ये होंठ और ये बाहें मेरी अमानत हैं
कभी कभी मेरे दिल में...
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे बजती हैं शहनाइयां सी राहों में
सुहाग रात है, घूँघट उठा रहा हूँ मैं
सिमट रही है, तू शरमा के अपनी बाहों में
कभी कभी मेरे दिल में...
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूँ ही
उठेगी मेरी तरफ़ प्यार की नज़र यूँ ही
मैं जानता हूँ के तू ग़ैर है, मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में...
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वासते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है
माना अपनी जेब से फ़कीर हैं
फिर भी यारों दिल के हम अमीर हैं
मिटे जो प्यार के लिए वो ज़िन्दगी
जले बहार के लिए वो ज़िन्दगी
किसी को हो ना हो हमें तो ऐतबार
जीना इसी का नाम है...
रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का
जिंदा है हमीं से नाम प्यार का
के मर के भी किसी को याद आयेंगे
किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे
कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है...
मजरूह सुल्तानपुरी
मजरूह सुल्तानपुरी
फ़िल्म : हम किसी से कम नहीं (1977)
संगीत : आर.डी.बर्मन
गीतकार : मजरूह सुल्तानपुरी
गायक : मो.रफ़ी
क्या हुआ तेरा वादा
वो कसम वो इरादा
भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें
वो दिन ज़िन्दगी का आखिरी दिन होगा
क्या हुआ..
याद है मुझको, तूने कहा था
तुमसे नहीं रूठेंगे कभी
दिल की तरह से हाथ मिले हैं
कैसे भला छूटेंगे कभी
तेरी बाहों में बीती हर शाम
बेवफा ये भी क्या याद नहीं
क्या हुआ..
ओ कहने वाले मुझको फरेबी
कौन फरेबी है ये बता
ओ जिसने गम लिया प्यार की खातिर
या जिस ने प्यार को बेच दिया
नशा दौलत का ऐसा भी क्या
के तुझे कुछ भी याद नहीं
क्या हुआ...
लिखे जो ख़त तुझे, वो तेरी याद में
हज़ारों रंग के, नज़ारे बन गए
सवेरा जब हुआ, तो फूल बन गए
जो रात आई तो, सितारे बन गए
कोई नगमा कहीं गूँजा, कहा दिल ने ये तू आई
कहीं चटकी कली कोई, मैं ये समझा तू शरमाई
कोई खुश्बू कहीं बिख़री, लगा ये ज़ुल्फ़ लहराई
लिखे जो खत तुझे...
फ़िज़ा रंगीं अदा रंगीं, ये इठलाना, ये शरमाना
ये अंगड़ाई, ये तन्हाई, ये तरसा कर चले जाना
बना देगा नहीं किसको, जवां जादू ये दीवाना
लिखे जो खत तुझे...
जहाँ तू है, वहाँ मैं हूँ, मेरे दिल की तू धड़कन है
मुसाफ़िर मैं, तू मंज़िल है, मैं प्यासा हूँ, तू सावन है
मेरी दुनिया, ये नज़रें हैं, मेरी जन्नत ये दामन में
लिखे जो खत तुझे...
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