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शायर चूंकि कोठे से निकलता था इसलिए उसकी शायरी 'अपवित्र' थीः मुनव्वर राना

Thought of munawwar rana about urdu shayri
                
                                                         
                            
मुनव्वर राना मानते हैं कि गजल को उसके कद के अनुरूप स्वीकार्यता आज जाकर मिली है, एक समय गजल 'अपवित्र' विधा थी। 

ग़ज़ल पर मुद्दतों से तरह-तरह के इल्ज़ाम लगते रहे। कई आलोचकों ने इस विधा को खारिज़ किया। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि ग़ज़ल कुछ खास मौज़ूआत की अमरबेल में मुद्दतों जकड़ी रही। इसके बावजूद हज़ारों ऐसे शेर कहे गए, जिन्होंने ग़ज़ल के कैनवस को बड़ा किया। गज़ल को आम लोगों तक पहुंचाया। हालांकि ग़ज़ल पर लगे इस इल्ज़ाम की असली वजह ये थी कि बहुत कम शब्दों में अपनी बात ग़ज़ल के माध्यम से ही कही जा सकती थी, फिर उस ज़माने में आम तौर से ग़ज़ल दरबारों में लिखी जाती थी और वहीं सुनी भी जाती थी। इसलिए दरबारी आदाब को नज़र में रखना पड़ता था। कई सारी गज़ले प्रशंसा में लिखी गईं। 

उर्दू शायर हमेशा मयखानों से निकलता हुआ और कोठों से उतरता हुआ दिखाई देता था। इसलिए उसकी शायरी को भी अपवित्र माना गया। इस हक़ीक़त से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उस वक़्त के राजे-महाराजे शायरों की परवरिश और नाज़-बरदारी भी करते थे, लेकिन गुज़रते वक़्त के साथ-साथ ग़ज़ल के शैदाई आम लोग भी होने लगे और हर ज़माने में जो चीज़ भी आवाम की पसंदीदा हो जाती है, उसका दाख़िला दरबारों में बंद हो जाता है। 

शायद यही सबब है कि ग़ज़ल जैसे ही गली के मोड़, शहर के चौराहों, कस्बात के चबूतरों और खेत-खलिहानों में भी मौज़ूआत की तलाश में भटकने लगी तो इसने नए-नए मंज़रनामे भी तलाश कर लिए। शब्दकोशों के मुताबिक़ ग़ज़ल का मतलब महबूब से बातें करना है। अगर इसे सच मान लिया जाए तो फिर महबूबा 'मां' क्यों नहीं हो सकती !

मेरी शायरी पर मुद्दतों, बल्कि अब तक ज़्यादा पढ़े-लिखे लोग इमोशनल ब्लैकमैलिंग का इल्ज़ाम लगाते रहे हैं। अगर इस इल्ज़ाम को सही मान लिया जाए तो फिर महबूब के हुस्न, उसके जिस्म, उसके शबाब, उसके रुख़ व रुख़सार, उसके होंठ, उसके जोबन और उसकी कमर की पैमाइश को अय्याशी क्यों नहीं कहा जाता है ! अगर मेरे शेर इमोशनल ब्लैकमैलिंग हैं तो श्रवण कुमार की फरमां-बरदारी को ये नाम क्यों नहीं दिया गया! जन्नत मां के पैरों के नीचे है, इसे गलत क्यों नहीं कहा गया !

मैं पूरी ईमानदारी से इस बात का तहरीरी इक़रार करता हूं कि मैं दुनिया के सबसे मुक़द्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ़ इसलिए करता हूं कि अगर मेरे शेर पढ़कर कोई भी बेटा मां की ख़िदमत और ख़याल करने लगे, रिश्तों का एहतेराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए।


                                    ज़रा-सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाये, 
                                    दिये से मेरी मां मेरे लिए काजल बनाती है।
                                                                                                                                                                                                                           
                                     -मुनव्वर राना
9 वर्ष पहले

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