आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शारिक़ कैफ़ी: होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या

shariq kaifi famous ghazal hone se mere farq hi padhta tha bhala kya
                
                                                         
                            


होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या
मैं आज न जागा तो सवेरा न हुआ क्या

सब भीगी रुतें नींद के उस पार हैं शायद
लगती है ज़रा आँख तो आती है हवा क्या

हम खोज में जिस की हैं परेशान अज़ल से
बीमार की आँखों ने वो दर ढूँढ़ लिया क्या

मक़्तूल को बाँहों में लिए बैठा रहूँ क्यूँ
इस जुर्म से लेना है उसे और मज़ा क्या

दीवार क़फ़स की हो कि घर की मुझे क्या फ़र्क़
तफ़रीह के सामाँ हों मयस्सर तो सज़ा क्या

ऐसा तो कभी रक़्स में बे-ख़ुद न हवा मैं
मय-ख़ाने के माहौल में होता है नशा क्या

ये धूप की तेज़ी ये सराबों की सजावट
सहरा ने जुनूँ को मिरे पहचान लिया क्या

2 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर