जो कुछ था देय, दिया तुमने,
सब लेकर भी हम हाथ पसारे हुए
खड़े हैं आशा में;
लेकिन, छींटों के आगे जीभ नहीं खुलती,
बेबसी बोलती है आंसू की भाषा में।
वसुधा को सागर से निकाल बाहर लाये,
किरणों का बन्धन काट उन्हें उन्मुक्त किया,
आंसुओं-पसीनों से न आग जब बुझ पायी,
बापू! तुमने आख़िर को अपना रक्त दिया।
(1)
छिपा दिया है राजनीति ने बापू! तुमको,
लोग समझते यही कि तुम चरखा-तकली हो।
नहीं जानते वे, विकास की पीड़ाओं से
वसुधा ने हो विकल तुम्हें उत्पन्न किया था।
(2)
एक देश में बांध संकुचित करो न इसको,
गांधी का कर्तव्य-क्षेत्र दिक नहीं, काल है।
गांधी हैं कल्पना जगत के अगले युग की,
गांधी मानवता का अगला उद्विकास हैं।
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बापू के लिए सुभाषित
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