सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है
यह पंक्तियां रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से प्रसिद्ध हो गयीं। संभवत: इसके कारण रहे होंगे कि यह शेर जिस ग़ज़ल का है उसमें बिस्मिल का तख़ल्लुस है और दूसरा यह कि फांसी पर चढ़ने से पहले रामप्रसाद बिस्मिल ने इसे पूरे जोशोखरोश से गाया था। वास्तव में इस शेर को लिखने वाले शायर ‘बिस्मिल अज़ीमाबादी’ हैं।
हालांकि रामप्रसाद बिस्मिल स्वयं भी कविताएं लिखा करते थे। उनकी कविताओं में देश-प्रेम प्रतिबिम्बित होता है। बि्स्मिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी थे जिन्हें 30 साल की उम्र में फ़ांसी दे दी गयी थी। वह ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध काकोरी कांड जैसी घटनाओं में शामिल रहे।
वह ग़ज़ल जिसे बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा और रामप्रसाद बिस्मिल ने गाया
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वाए क़िस्मत पांव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं
कारवां अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है
रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है
शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हां जादा-ए-मंज़िल में है
आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
आएं वो शौक़-ए-शहादत जिन के जिन के दिल में है
मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
माने-ए-इज़हार तुम को है हया, हम को अदब
कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूं बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्यूं बताएं क्या हमारे दिल में है
अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमां की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-'बिस्मिल' में है
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वह ग़ज़ल जिसे बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा और रामप्रसाद बिस्मिल ने गाया
6 वर्ष पहले
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