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हर आदमी में होते हैं, दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना : निदा फ़ाज़ली

Nida Fazli
                
                                                         
                            वैसे तो दुनिया इतनी बड़ी है। देश विदेश में कविता और शायरी की महक है। उसकी व्याप्ति और पहुँच का विस्तार है। जो हमारे ख़्यालों को रोशन करते हैं। पता नहीं क्यों मुझे निदा की शायरी से रश्क है। लगता है उनकी शायरी पढ़-सुन और गुन कर मुझे रूहानी ख़ुशी मिलती है। निदा की सादगी मुझे बहुत भली और सुहानी लगती है। उसकी कहनभंगिमा मुझे लुभाती है, शायद इसीलिये वह मेरे मनमाफ़िक है। निदा में एक बुलन्दगी भी है और एक खुशनुमा अहसास भी। महेश अश्क का एक शेर मेरे ज़ेहन में बजता है। जिसमें कुछ बेचारगियाँ करवट लेती हैं। 
                                                                 
                            

“बिजलियाँ, लपटें आशियाँ और हम 
हर तरफ़ फैलता धुआँ और हम।” 


निदा के दो शेर देखें- 

दीवारो-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं 
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयाँ बोलती हैं।  
सुनने की मुहलत मिले तो आवाज़ है पत्थरों में 
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं। 


जब मैं निदा फ़ाज़ली को याद करता हूँ तो मेरे जेहन में परवीन शाकिर, फहमीदा रियाज़, अदम गोंडवी भी याद आते हैं। हालांकि इन सबकी शायरी के मिज़ाज अलग-अलग थे। अन्दाजे़-बयां अलग-अलग थे लेकिन इन सबका सीधा असर आदमी पर ज़रूर पड़ता था। परवीन शाकिर और फहमीदा रियाज़ की बातें इसलिये कि ये दोनों बहुत बारीक लहज़े में साधारण ढंग से अपनी बात कहती थीं। अदम गोंडवी सीधे तौर पर हमारे समाज, समय और वास्तविकताओं का मुकम्मल बखान करते थे। निदा फ़ाज़ली को पढ़ते हुये मुझे उर्दू की सहजता के धनी, आम लोगों की ज़बान में बात करने वाले रचनाकार नज़ीर बनारसी भी याद आते हैं, चाहे वह कृष्ण कन्हैया का बचपन हो या देख बहारें होली की हों। 
 

भारत में सामाजिक परिवर्तनों की एक लम्बी श्रृंखला है और राजनैतिक परिवर्तनों का तो कहना ही क्या? यह दौर ऐसा है कि भारत में तरह-तरह की चर्चाएं आम हो रहीं हैं। सामाजिक सौहार्द्र और आपसी भाईचारे पर अमन चैन वाली स्थितियों पर लगातार वार हो रहे हैं। कोई कुछ बोलने की प्रायः जुर्रत नहीं करता। संविधान को भी प्रश्नांकनों के दायरे में लेने की स्थितियाँ बड़ी तादाद में बढ़ी हैं। राजनीति हो या साम्प्रदायिक सद्भाव के तमाम मुद्दे हमें क़ायदे से जीने नहीं देते। जनतंत्र जो अब तक की सबसे बेहतर व्यवस्था है वह भी दांव पर लगी है। जनतंत्र के रूप में तानाशाही का निरंतर विकास हो रहा है। जो इस दौर में सबसे अहम और सबसे बड़ा सवाल है। हालात चिन्ताजनक और अफ़सोसजनक है।

संस्कृति से रिश्ता रखने वाले इस पर निरंतर सवाल रख रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं। ये हमारे भीतर खलबली मचाते हैं। इंसानियत के टुकड़े-टुकड़े हो रहे हैं। अलगाववादी ताकतें और मौक़ापरस्ती पूरे शबाब पर है। ऐसे कठिन समय में निदा फ़ाज़ली हमारे बीच नहीं रहे, जब उनकी शायरी और कार्यवाहियों की बेहद ज़रूरत थी। पिछले साल 8 फरवरी को उनका निधन हो गया। वे ऐसे शायर रहे हैं जिन्होंने अमनपरस्ती के लिये साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये मनुष्यता के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगाया। निरंतर इस तरह के प्रश्नों से वे जूझते रहे। 
    
चलती-फिरती धूप-छांव से चेहरा बाद में बनता है 
पहले पहले सभी ख़्यालों से तस्वीर बनाते हैं। 
आँखों देखी कहने वाले पहले भी कम-कम ही थे 
अब तो सब ही सुनी सुनाई बातों को दोहराते हैं। 
इस धरती पर आकर, अपना कुछ खो जाता है 
कुछ रोते हैं, कुछ इस ग़म में अपनी ग़ज़ल सजाते हैं। 
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5 वर्ष पहले

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