आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उड़ने वाला फूल: छोटी-छोटी चीज़ों में छिपे बड़े जीवन की कथा

upasna book udne wala phool book review in hindi
                
                                                         
                            
समीक्षक - कुमारी उर्वशी  
सहायक प्राध्यापिका, 
हिंदी विभाग, रांची विमेंस कॉलेज  

उपासना की पुस्तक ‘उड़ने वाला फूल’ को पढ़ना दरअसल उन चीज़ों को पहली बार सचमुच देखना है, जिन्हें हम रोज़ देखते हुए भी देख नहीं पाते। यह पुस्तक घटनाओं की चकाचौंध से दूर, जीवन के उन सूक्ष्म और लगभग अनाम क्षणों को पकड़ती है जिनमें हमारी संवेदना का बहुत बड़ा हिस्सा छिपा रहता है। एक फूल का संकोच, किसी रात का अकेलापन, स्कूल की उनींदी सुबह, अमलतास के नीचे बैठी लड़की, सावन-भादो की आत्मीयता, सहजन की झरती कलियाँ, इमली के तने की झुर्रियों में जमा बचपन, सपने के भीतर रंगों की तलाश और पेट में कुलबुलाती भूख—उपासना इन सबको जिस तरह देखती और शब्द देती हैं, उससे साधारण जीवन असाधारण अर्थों से भर उठता है। ‘उड़ने वाला फूल’ इसलिए केवल रचनाओं का संग्रह नहीं, एक ऐसी दृष्टि का दस्तावेज़ है जो संसार को उसकी बाहरी आकृति से अधिक उसके भीतर धड़कते अर्थों में देखती है। 

इन रचनाओं की सबसे पहली और सबसे आकर्षक विशेषता उनका विधागत तरलपन है। इन्हें केवल कहानी कहना पर्याप्त नहीं होगा, केवल कविता कहना भी नहीं। कहीं वे फ़्लैश फिक्शन की तरह एक क्षण को पकड़कर अचानक अर्थ का द्वार खोल देती हैं, कहीं संस्मरण की आत्मीयता में उतर जाती हैं, कहीं स्केच की तरह किसी दृश्य की कुछ रेखाएँ खींचकर उसे जीवंत कर देती हैं और कहीं कविता की लय, बिम्ब और संकेतात्मकता इन्हें पूरी तरह अपने घेरे में ले लेते हैं। लेकिन यह विधा-भंग किसी साहित्यिक प्रयोग के प्रदर्शन के लिए नहीं है। उपासना के यहाँ विधा अनुभूति के पीछे चलती है, अनुभूति विधा के पीछे नहीं। जिस क्षण को जिस रूप की आवश्यकता होती है, रचना उसी रूप में आकार ग्रहण कर लेती है। यही कारण है कि इनका छोटा आकार कभी इनके अर्थ को छोटा नहीं करता। 

उपासना की रचनात्मक दुनिया का केंद्र शायद ‘दृष्टि’ है—वह दृष्टि जो चीज़ों के पार जाकर उनके भीतर देखती है। ‘झुलफुलाह’ में रात केवल रात नहीं है। वहाँ अँधेरा बिन्दु-सी उभरती किसी आकृति से लेकर चाँद, बादल, सुकहवा, सेम की लताएँ और फालसई फूल तक एक ऐसे जीवित संसार में बदल जाता है जहाँ प्रकृति की हर वस्तु का अपना मन है, अपनी गति है, अपनी नींद और अपनी जागृति है। “फूलों को तो वक़्त पर जगना होता है न! जगेंगे तभी तो खिलेंगे”—यह वाक्य फूलों के संदर्भ से आगे निकलकर जीवन का रूपक बन जाता है। खिलना केवल फूल का धर्म नहीं, जीवन का भी स्वभाव है; और उसके लिए समय पर जागना आवश्यक है। उपासना की खूबी यही है कि वे दर्शन को दर्शन की भाषा में नहीं कहतीं; वे उसे एक दृश्य में रख देती हैं। 

उनकी प्रकृति-दृष्टि भी उल्लेखनीय है। प्रकृति उनके यहाँ सजावटी पृष्ठभूमि नहीं है जिस पर मनुष्य की कहानी घटित होती है; प्रकृति स्वयं एक सक्रिय चरित्र है। ‘गोधूलि’ में लौटता हुआ सूरज, पोखर में लालिमा, चाँदी की बूँदों-सी उछलती मछलियाँ, घर की ओर जाती बकरियाँ और स्मार्टफोन की रोशनी में चमकती बिछिया की आँखें—यह पूरा दृश्य परंपरा और वर्तमान के बीच एक सुंदर सेतु बन जाता है। बकरियाँ घर लौटने की खुशी महसूस करती हैं और मनुष्य अपने फोन की रोशनी में व्यस्त है—यहाँ आधुनिकता किसी घोषणा के रूप में नहीं, जीवन के सहज दृश्य में उपस्थित है। उपासना की दृष्टि का सौंदर्य इसी सहजता में है। 
आगे पढ़ें

4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर