आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जीवन में क्रोध और शोर ही नहीं, फूल व तितलियां भी हैं

शूल और फूल
                
                                                         
                            मेरे पिता युद्ध में मारे गए थे और मेरी मां का देहांत तब हुआ, जब मैं मात्र ग्यारह वर्ष का था। उसके बाद मुझे एक धार्मिक संस्थान में अध्ययन के लिए भेज दिया गया, जहां का अनुशासन बहुत सख्त था। मेरी मां धार्मिक महिला थीं और वह चाहती थीं कि मुझे धार्मिक शिक्षा मिले। लेकिन विडंबना देखिए कि मैं नास्तिक बन गया। यह मेरी किताबों में भी स्पष्ट है।
                                                                
                
                
                 
                                    
                     
                                             
                                                

हालांकि मैं बचपन में ही अनाथ हो गया था...

हालांकि मैं बचपन में ही अनाथ हो गया था, लेकिन अपने चाचा, चाची और अपने चचेरे भाई-बहनों के प्यार के कारण मेरा बचपन अपेक्षाकृत खुशहाल ही था। पूरे जीवन में कई बार भाग्य ने मेरा साथ दिया। उन सभी अवसरों का जिक्र करने में लंबा वक्त लगेगा, लेकिन एक अवसर का उल्लेख करना चाहूंगा-1940 में मेरे स्क्वाड्र्न पर जर्मन टैंको से घात लगाकर हमला किया गया। गोलाबारी के दौरान हमें पैदल लड़ाई करने का आदेश दिया गया, फिर कुछ ही देर बाद हमें घोड़े पर सवार होकर लड़ने का आदेश दिया गया। जैसे ही मैंने अपना पैर रकाब में डाला, घोड़े की जीन खिसक गई। लड़ाई के बीच में मैंने सोचा, आह मेरी किस्मत! लेकिन उसी ने मुझे बचाया, फिसलकर गिरते हुए मैं एक ऐसी जगह जा पहुंचा, जहां कोई मुझ मार नहीं सकता था। जो लोग घोड़े पर सवार हो गए थे, उनमें से अधिकांश मारे गए।
आगे पढ़ें

हालांकि मैं बचपन में ही अनाथ हो गया था...

एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर