शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
रौनक़ें जितनी यहां हैं औरतों के दम से हैं
- मुनीर नियाज़ी
औरत को समझता था जो मर्दों का खिलौना
उस शख़्स को दामाद भी वैसा ही मिला है
- तनवीर सिप्रा
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