शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
रौनक़ें जितनी यहां हैं औरतों के दम से हैं
- मुनीर नियाज़ी
औरत को समझता था जो मर्दों का खिलौना
उस शख़्स को दामाद भी वैसा ही मिला है
- तनवीर सिप्रा
तमाम पैकर-ए-बदसूरती है मर्द की ज़ात
मुझे यक़ीं है ख़ुदा मर्द हो नहीं सकता
- फ़रहत एहसास
औरत अपना आप बचाए तब भी मुजरिम होती है
औरत अपना आप गंवाए तब भी मुजरिम होती है
- नीलमा सरवर
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X