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बेटे की नज़र में नीरज का फक्कड़पन कबीर की वाणी जैसा है.....

Gopaldas Neeraj
                
                                                         
                            शायद ये मेरे लिए काफी मुश्किल भरा सफर होने वाला है, क्योंकि मैंने लिखने से पहले कई बार सोचा कि आप लोग क्या सोचेंगे। नीरज के पुत्र ने लिखा है शायद कुछ नया लिखा होगा। आप मेरे लेख की हर लाइन में नीरज के गीतों की तरूणाई, शैशव का संघर्ष, श्रृंगार का यौवन, नीरज नैना की मस्ती, नीरज की यायावारी, उनका  फक्कड़पन, उनकी वेदना, मेरे शब्दों का चयन, इन सब को तलाशेंगे। आप पूरा लेख पढ़ लेंगे और फिर आंकलन करेंगे। आप स्वच्छंद है ऐसा करने के लिए क्योंकि सृजन के लिए शायद उन्मुक्त होना ज़रूरी होता है, और कविता के लिए सहज होना ज़रूरी है। अगर आप सोच कर कविता लिख रहे हैं तो फिर गद्य का जन्म  होता। कविता लिखी नहीं जाती वो ख़ुद लिख जाती है, वैसे ही जैसे पहाड़ों पर निर्झर और फूलों पर ओस की कहानी लिख जाती है। जिस प्रकार जल-जलकर बुझ जाना दीपक के जीवन की विवशता है, गा-गाकर चुप हो जाना नीरज के काव्य की मजबूरी है। मजबूरी माने वो नीरज के जीवन की विवशता है, अस्तितव की शर्त है, अनिवर्यता है। वह मुक्त है और मोक्ष भी, तभी तो न वह किसी वाद की अनुगामिनी है और न किसी सिंद्धांत की भामिनी, 
                                                                 
                            

आयु है जितनी समय की गीत की उतनी उमर है 
चांदनी जब से हंसी है, रागनी तब से मुखर है 
जिंदगी गीता स्वंय जान ले गाना अगर हम 
हर सिसकती सांस लय है, हर छलकता अश्रु स्वर है 
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बस यही अपराध में हर बार करता हूं 

8 वर्ष पहले

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