आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मोहसिन एहसान: किसी को ध्यान ही आया न रुत बदलने का

mohsin ehsan famous ghazal kisi ko dhyan hi aya na rut badalne ka
                
                                                         
                            

किसी को ध्यान ही आया न रुत बदलने का
था इंतिज़ार हर इक को हवा के चलने का

वही पुराने मुसाफ़िर मिले नई रह पर
था इफ़्तिख़ार हमें जिन से बच निकलने का

अब एक दूसरे को मुड़ के देखते भी नहीं
कभी था ज़ो'म बहुत साथ साथ चलने का

वो संग-दिल सही आग़ोश-ए-आरज़ू में मगर
हर एक पल उसे एहसास था पिघलने का

घिरा हुआ हूँ हिसार-ए-हयात में कब से
कोई भी रास्ता मिलता नहीं निकलने का

गिला नहीं कोई तुझ से निगाह-ए-नश्शा-ए-यार
मैं ख़ुद गिरा कि इरादा न था सँभलने का

तुलू'-ए-सुब्ह ख़ुदा जाने क्या समाँ लाए
लगा है शाम से धड़का सा रात ढलने का

विसाल-ए-यार में कब है फ़िराक़-ए-यार की बात
'अजीब लुत्फ़ है 'मोहसिन' वफ़ा में जलने का

3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर