आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अहमद मुश्ताक़ की ग़ज़ल: वो वक़्त भी आता है जब आँखों में हमारी

उर्दू अदब
                
                                                         
                            किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता
                                                                 
                            
इक ख़्वाब-ए-मोहब्बत है कि बूढ़ा नहीं होता

वो वक़्त भी आता है जब आँखों में हमारी
फिरती हैं वो शक्लें जिन्हें देखा नहीं होता

बारिश वो बरसती है कि भर जाते हैं जल-थल
देखो तो कहीं अब्र का टुकड़ा नहीं होता

घिर जाता है दिल दर्द की हर बंद गली में
चाहो कि निकल जाएँ तो रस्ता नहीं होता

यादों पे भी जम जाती है जब गर्द-ए-ज़माना
मिलता है वो पैग़ाम कि पहुँचा नहीं होता

तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से
लेकिन वो किसी वक़्त अकेला नहीं होता

क्या उस से गिला कीजिए बर्बादी-ए-दिल का
हम से भी तो इज़्हार-ए-तमन्ना नहीं होता

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o  


 
3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर