उर्दू शायरी में 'एहसास' शब्द को कई संदर्भों में शायरों ने प्रयोग किया है। 'एहसास' यानि एक ऐसा भाव जिसे सिर्फ महसूस किया जा सके। पेश है 'एहसास' पर शायरों के अल्फ़ाज़-
मेरी बहकी हुई बातों का बुरा मत मानो
मेरे एहसास को तहज़ीब कुचल देती है
- अख़्तर पयामी
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया
ख़ुश हूँ कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया
- अब्दुल हमीद अदम
मुझ को एहसास है लेकिन तुझे एहसास नहीं
तेरे दामन की हवा मेरे लिए रास नहीं
- नरेश कुमार शाद
मैंने औरों से सुना है....
इक तरफ़ सोच इक तरफ़ एहसास
दो गिरोहों में बट गया हूँ मैं
- मुज़फ्फ़र बुख़ारी
सब अपने आईने उस ने मुझी को सौंप दिए
उसे शिकस्त का एहसास था बहुत गहरा
- फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को
मैंने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं
- आसी उल्दनी
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
- बशीर बद्र
इसी कमी का है एहसास और हैरानी
हैं और तो सभी मौजूद हम किधर गए हैं
- ज़फ़र इक़बाल
तू मेरा हो के भी मेरा नहीं है
यही एहसास दिल को डस रहा है
तू मेरा हो के भी मेरा नहीं है
- शहाब अशरफ़
इसी तूफ़ान में घिर जाते हैं लाखों साहिल
एक राही जिसे एहसास न हसरत न तलब
- मुस्तफ़ा ज़ैदी
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....मगर एहसास रह गया
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