ब्रजभाषा उस बोली को कहा जाता है जो अपने नाम को चरितार्थ करते हुए ब्रज क्षेत्र में बोली जाती है। एक लंबे दौर के लिए साहित्य की आवाज़ बनने वाली इस भाषा ने समय के साथ विकास किया और बोली से भाषा का स्थान प्राप्त किया।
उदाहरण-
देखे मैं छबी आज अति बिचित्र हरिकी
आरुण चरण कुलिशकंज । चंदनसो करत रंग
सूरदास जंघ जुगुली खंब कदली । कटी जोकी हरिकी
उदर मध्य रोमावली । भवर उठत सरिता चली
वत्सांकित हृदय भान । चोकि हिरनकी (सूरदास)
आर्य भाषा की परंपरा से आने वाली ब्रजभाषा की उत्पत्ति शौरसेनी भाषा से मानी जाती है। संस्कृत व प्राकृत भाषाओं का प्रचलन कम होने के बाद साहित्य की रचना ब्रजभाषा में की जाने लगी। भक्तिकाल के समय में ब्रजभाषा में भक्ति-काव्य की रचना की गयी, गोकुल के बल्लभ संप्रदाय का केन्द्र बनने के बाद कृष्ण संबंधी कई पद इस भाषा में लिखे गए और यह साहित्य की प्रमुख भाषा बन गयी।
मुख्यत: यह भाषा मथुरा व उसके आस-पास के क्षेत्रों में तो बोली ही जाती है साथ ही यह अलीगढ़, आगरा, भरतपुर और धौलपुर ज़िलों में भी बोली जाती है। बुन्देलखण्ड में बोली जाने वाली 'बुन्देली' भी ब्रज का ही एक रूप है। ब्रज भाषा में सिर्फ़ भक्ति के पद ही नहीं रचित हुए बल्कि कई और रस भी पढ़ने को मिलते हैं 'भारतेन्दु रचित मुकरियां' इसका एक उदाहरण है।
पेश हैं ब्रजभाषा में रचित कुछ पद
सुमिर मन गोपाल लाल सुंदर अति रूप जाल
मिटिहैं जंजाल सकल निरखत सँग गोप बाल
मोर मुकुट सीस धरे, बनमाला सुभग गरे
सबको मन हरे देख कुंडल की झलक गाल
- छीतस्वामी
हरि जनकू हरिनाम बडो धन हरि जनकू हरिनाम
बिन रखवाले चोर नहि चोरत सुवत है सुख धाम
दिन दीन होते सवाई दोढी धरत नहीं कछु दाम
सुरदास दोढी धरत नहीं कछु दाम
प्रभु सेवा जाकी पारससुं कहां काम
- सूरदास
साभार- कविताकोश
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