भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी साहित्य के एक पूरे युग का प्रतिनिधित्व करतें हैं, जिसे साहित्य में 'भारतेंदु युग' के नाम से जाना जाता है। भारतेंदु जी की मुकरियां 'लोक जीवन' में खूब प्रचलित हुईंं।
मुकरी एक बहुविकल्पी शब्द है, जिसका लक्ष्य मनोरंजन के साथ-साथ बौद्धिक कुशलता की परीक्षा भी होती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी मुकरियों में मनोरंजन तो करते ही थे, अपने समय में अंग्रेजों की नस्लीय सोच पर प्रहार भी करते थे।
पेश है उनकी कुछ मुकरियां जिन्हें 'नये जमाने की मुकरियां' के नाम से जाना जाता है-
सीटी देकर पास बुलावै
रुपया ले तो निकट बिठावै
ले भागै मोहिं खेलहिं खेल
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि रेल ।
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेजी
सब गुरुजन को बुरो बतावै
अपनी खिचड़ी अलग पकावै
भीतर तत्व न झूठी तेजी
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेजी ।
तीन बुलाए तेरह आवैं
निज निज बिपता रोइ सुनावैं
आँखौ फूटे भरा न पेट
क्यों सखि सज्जन नहिं ग्रैजुएट ।
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि चुंगी
धन लेकर कछु काम न आव
ऊँची नीची राह दिखाव
समय पड़े पर सीधै गूंगी
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि चुंगी ।
भीतर भीतर सब रस चूसै
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै
जाहिर बातन मैं अति तेज
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज ।
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि पुलिस
रूप दिखावत सरबस लूटै
फंदे मैं जो पड़ै न छूटैं
कपट कटारी जिय मैं हुलिस
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि पुलिस ।
सतएँ अठएँ मों घर आवै
तरह तरह की बात सुनाव
घर बैठा ही जोड़ै तार
क्यों सखि सज्जन नहिं अखबार ।
क्यों सखि सज्जन नहीं जहाज
मुँह जब लागै तब नहिं छूटै
जाति मान धन सब कुछ लूटै
पागल करि मोहिं करे खराब
क्यों सखि सज्जन नहिं सराब ।
लंगर छोड़ि खड़ा हो झूमै
उलटी गति प्रति कूलहि चूमै
देस देस डोलै सजि साज
क्यों सखि सज्जन नहीं जहाज ।
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क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेजी
4 वर्ष पहले
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