जाबिर हुसैन का जन्म सन 1945 में गाँव नौनहीं राजगिर, जिला-नालंदा, बिहार में हुआ। आप अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। सक्रिय राजनीति में भाग लेते हुए 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और मंत्री बने।
अपने लंबे राजनैतिक-सामाजिक जीवन के अनुभवों में उपस्थित आम आदमी के संघर्षों को उन्होंने अपने साहित्य में प्रकट किया है। संघर्षरत आम आदमी और विशिष्ट व्यक्तित्वों पर लिखी गई उनकी डायरियाँ चर्चित-प्रशंसित हुई हैं।
जाबिर हुसैन ने डायरी विधा में एक अभिनव प्रयोग किया है जो अपनी प्रस्तुति, शैली और शिल्प में नवीन है। जाबिर हुसैन की कविताएं, बेतरतीब ख़्वाबों की तरह, उनके वजूद की रेतीली ज़मीन पर उतरती हैं, उस पर अपने निशान बनाती हैं। पेश है जाबिर हुसैन की 5 बेहतरीन कविताएं-
जाने
कितनी सदियों से
हमने
अपनी आंखों में
दर्द के साये
पाले हैं
जाने
कितनी सदियों से
हमने
अपनी आंखों पे
ख़ौफ़ के साये
डाले हैं
तुम
आ जाओ तो
शायद
इन आंखों से
ख़ौफ़ का साया
हट जाये
दर्द की दुनिया
बंट जाये
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पत्ते तो तैयार थे
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