जैसे तुझे स्वीकार हो।
डोलती डाली, प्रकंपित पात, पाटल-स्तंभ विलुलित,
खिल गया है सुमन मृदु-दल, बिखरते किंजल्क प्रमुदित,
स्नात मधु से अंग, रंजित-राग केशर-अंजली से स्तब्ध-सौरभ है निवेदित :
मलय मारुत, और अब जैसे तुझे स्वीकार हो।
पंख कंपन-शिथिल, ग्रीवा उठी, डगमग पैर, तन्मय दीठ अपलक,
कौन ऋतु है, राशि क्या, है कौन-सा नक्षत्र, गत-शंका, द्विधा-हत बिंदु अथवा वज्र हो—
चंचु खोले, आत्म-विस्मृत हो गया है यती चातक :
स्वाति, नीरद, नील-द्युति, जैसे तुझे स्वीकार हो।
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