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Hindi Poetry: अज्ञेय की कविता- जैसे तुझे स्वीकार हो

कविता
                
                                                         
                            जैसे तुझे स्वीकार हो। 
                                                                 
                            

डोलती डाली, प्रकंपित पात, पाटल-स्तंभ विलुलित, 
खिल गया है सुमन मृदु-दल, बिखरते किंजल्क प्रमुदित, 

स्नात मधु से अंग, रंजित-राग केशर-अंजली से स्तब्ध-सौरभ है निवेदित : 
मलय मारुत, और अब जैसे तुझे स्वीकार हो। 

पंख कंपन-शिथिल, ग्रीवा उठी, डगमग पैर, तन्मय दीठ अपलक, 
कौन ऋतु है, राशि क्या, है कौन-सा नक्षत्र, गत-शंका, द्विधा-हत बिंदु अथवा वज्र हो— 
चंचु खोले, आत्म-विस्मृत हो गया है यती चातक : 
स्वाति, नीरद, नील-द्युति, जैसे तुझे स्वीकार हो।  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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