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इन पांच बड़े शायरों ने मोहब्बत को ज़रा इस अंदाज़ से देखा...

These five big shayar saw love in this style
                
                                                         
                            मोहब्बत के शायर हैं जिगर मुरादाबादी 
                                                                 
                            

निदा फ़ाज़ली ने जिगर मुरादाबादी को मोहब्बत का शायर क़रार दिया है। बक़ौल निदा वह मिज़ाज से आशिक़ और तबियत से हुस्नपरस्त ‌थे। ऐसे में उनकी नज़्मों में मोहब्बत का मचलना स्वाभाविक है। उनकी आशिक़ाना ज़िंदगी की शुरुआत छह साल की उम्र में होती है। उनकी मोहब्बत का आलम यह था कि वह एक कश्मीरी भिखारिन की आंखों से उसके सौंदर्य को देखकर ऐसे मुग्‍ध होते थे कि घर में जितना पैसा और अनाज होता है, सब उसके हवाले कर देते। 

ज़िगर के बारे में निदा कहते हैं कि उन्होंने मोहब्बत के ज़रिए आग के दरिया में अपने वजूद को इस तरह जलाया कि वह अपने जीवन काल में ही इश्क की तहज़ीब का मिसाली प्रतीक बन गए। जिगर ने मोहब्बत को आसान काम नहीं माना है। उसकी तुलना आग के दरिये से की है। जिगर की मोहब्बत को इस ग़ज़ल में देखिए...

इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत का अदना सा फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़, फ़ैले तो ज़माना है

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हंसने को ज़माना है

ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है

वो हुस्न-ओ-जमाल उन का, ये इश्क़-ओ-शबाब अपना
जीने की तमन्ना है, मरने का ज़माना है

अश्क़ों के तबस्सुम में, आहों के तरन्नुम में
मासूम मुहब्बत का मासूम फ़साना है

क्या हुस्न ने समझा है, क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक-नशीनों की, ठोकर में ज़माना है

या वो थे ख़फ़ा हमसे या हम थे ख़फ़ा उनसे
कल उनका ज़माना था, आज अपना ज़माना है


 

मोहब्बत में दर्द होता है ये बशीर साहब बताते हैं...

बशीर बद्र की नज़्मों में मोहब्बत का दर्द समाया हुआ है। उनकी शायरी का एक-एक लफ़्ज़ इसका गवाह है। बद्र साहब अपनी ग़ज़लों में मोहब्बत के इज़हार में परंपरागत प्रतीकों का इस्तेमाल कम और ज़िंदगी के अनुभवों, रूपकों और प्रतीकों का इस्‍तेमाल ज्यादा करते हैं।

रौशनी के लिए जलते रहने की अनिवार्यता भी उनकी मोहब्बत की पहचान का एक रंग है। इश्क़ और वफ़ा के ऐसे ही अशआर के बीच वे ज़िंदगी की सही तस्वीर भी दिखाते जाते हैं। मोहब्बत उनकी नज़्मों में लिपटी हुई है। उन्होंने लिखा है, एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊंगा, जिंदगी मुझको तेरा पता चाहिए। उन्हीं के एक शेर मोहब्बत की मजबूरियों और धुन को समझिए...

होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते

पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आंखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते

दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है
अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते

उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं
ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते

अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते


एक और ग़ज़ल देखिए...

कभी तो आसमा से चांद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की एक खूबसूरत शाम हो जाए

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए
चराग़ों की तरह आंखें जलें, जब शाम हो जाए

मैं ख़ुद भी अहतियातन, उस गली से कम गुजरता हूं
कोई मासूम क्यों मेरे लिए, बदनाम हो जाए

अजब हालात थे, यूं दिल का सौदा हो गया आख़िर
मुहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए

समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको
हवायें तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए

मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहां होगा
परिंदा आस्मां छूने में जब नाकाम हो जाए

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए

 
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मोहब्बत में दर्द होता है ये बशीर साहब बताते हैं...

9 वर्ष पहले

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