आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चन्द्र शेखर आजाद के लिए श्रीकृष्ण सरल की कविता: मैं आजादी के परवानों का दीवाना  

chandra shekhar azad
                
                                                         
                            मैं आजादी के परवानों का दीवाना,
                                                                 
                            
मैं आजादी की डगर-डगर में घूमा हूँ
आजाद चन्द्रशेखर की है जो याद लिए,
उस ग्राम-ग्राम में, नगर-नगर में घूमा हूँ।

कंकड़-पत्थर, गलियों-चौराहों को मैंने,
उस महाबली की याद सँजोते देखा है
जिनसे उसके जीवन की गाथा जुड़ी हुई,
उन वृक्षों को भी मैंने रोते देखा है।

वह कुटिया, जिसमें उसने प्रथम साँस ली थी,
कहती, मुझको बेटे की आहट आती है
वे चट्टानें, जिन पर वह खेला-कूदा था,
उन चट्टानों की भी छाती फट जाती है।

मेरे पैरों से लिपट धूल ने पूछा था
जो मुझमें खेला, वह मेरा फौलाद कहाँ?
हर मेंढ़, डगर, पगडण्डी ने भी प्रश्न किया,
आजाद कहाँ? आजाद कहाँ? आजाद कहाँ?

आजाद कहाँ, मैं इसका क्या उत्तर देता,
में उनको रोते और बिलखते छोड़ चला।
मैं घबराया, मेरा ही हृदय न फट जाए,
उस ग्राम-धरा से मैं अपना मुख मोड़ चला।

ओोरछा तीर्थ बन गया देश-भक्तों का जो,
जा पहुँचा मैं भी वहाँ सांत्वना पाने को।
क्या पता कि लेने के देने पड़ जायेंगे,
मैं धैर्य कहाँ से लाऊँ, हाल सुनाने को।
आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर