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सुनहरी यादें: रफ़ी साहब के लिए लिखी संगीतकार रवीन्द्र जैन की नज़्म... 

Mohammad Rafi
                
                                                         
                            पेशानी पे शम्स आंखों में तारों की ज़िया थी 
                                                                 
                            
वह कैसे बुझा जिसको ज़माने की दुआ थी 

हाजी था नमाज़ी था बड़ा नेक था बंदा
क्या इसके अलावा भी उसकी कोई ख़ता थी 

नग़मे तो तेरे फिर भी सुने जायेंगे लेकिन 
कुछ तेरी ज़रूरत हमें इसके सिवा भी थी 

अल्लाह वह रोज़ा था कि रोज़े-क़यामत
अफ़तारी का था वक़्त मगर सर पे क़ज़ा थी 

नाख़ुश था ख़ुदा अपने फ़रिश्तों से वगरना 
धरती के फ़रिश्ते की ज़रूरत उसे क्या थी 

साभार: पयंबर-ए-मौसीक़ी, मोहम्मद रफ़ी, चौधरी ज़िया इमाम,  (थाम्सन प्रेस) इंडिया
8 वर्ष पहले

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