जाबिर हुसेन अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक और राजनीतिज्ञ भी रहे हैं। उन्हें उनकी उर्दू कथा-डायरी 'रेत पर खेमा' के लिए साहित्य अकादमी सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है साथ ही उन्हें नवें विश्व हिंदी सम्मेलन में विश्व हिंदी सम्मान भी दिया गया था।
पता करो
तुमने देखा
इबादतखाने की दीवारों पर
ओस की चादर बिछ गई है
ताक पर सजे चिरागों की लौ
मंद पड़ गई है
दरवाजे-खिड़कियों पर
मकड़ी के बदरंग जाले
पसर गए हैं
आसमान में सितारों के झुंड
निस्तेज हो गए हैं
चांद का हमेशा
खिला रहने वाला चेहरा
मुरझा गया है
पता करो, कहीं
इन्सानों की इस वीरान बस्ती से
तुम्हारा खुदा
हमेशा हमेशा के लिए
रूठ तो नहीं गया!
प्रस्तुत कविता राजकमल प्रकाशन से छपकर आए कविता संग्रह 'ओक में बूंदें' से है।
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