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सुरेन्द्र मोहन मिश्र: हे मेरे बारह बच्चों के बाप, तुम्हें लग जाए शीतला मइया का शाप

hasya kavita of Surendra Mohan Mishra
                
                                                         
                            हे मेरे बारह बच्चों के बाप !
                                                                 
                            
तुम्हें लग जाए शीतला मइया का शाप !
पता नहीं आदमी हो या कसाई,
तुम्हें इस तरह जाते शर्म नहीं आई !

जाना ही था तो आधे बच्चे अपने साथ ले जाते,
आधे दर्जन मुझे दे जाते ।
पूरी प्लाटून, मेरे लिए ही छोड़ गए हो, 

एक इंजन से बारह डिब्बे जोड़ गए हो ।
जब कभी भी इनसे बहुत तंग हो जाती हूं, 
एक ही बात कहके डराती हूं :

"नहीं मानोगे तो, 
तुम्हारे बाप को वापिस बुलवा दूंगी, 
उनकी ढेर सारी कविताएं सुनवा दूंगी"

बच्चे सहम कर चुप होने लगते हैं, 
कुछ तो डरकर रोने लगते हैं ।

इसलिए, 
अगर तुम्हारी आंखों की, 
पूरी शर्म न बह गयी हो, 
थोड़ी-सी भी बाकी रह गयी हो, 
तो कभी घर लौट कर मत आना,
ज्यादा तुम्हें क्या समझाना ।

चाहे जहां नाचो, चाहे जहां गाते रहना, 
मनीआर्डर हर महीने, 
घर पर भिजवाते रहना ।
तुम्हारे प्राणों की प्यासी- 
श्रीमती सत्यानाशी ।

(सुरेन्द्र मोहन मिश्र की हास्य कविता 'गुमशुदा कवि के लिए विज्ञापन' के ये चुनिंदा अंश हैं, जो 'यार सप्तक' नाम की किताब से लिए गए हैं। यह किताब डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।)
9 वर्ष पहले

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