पूरब से ले के पश्चिम
उत्तर से ले के दक्खिन
लहजा भले अलग हो, मीठी है इसकी बोली
आओ लगाएं अक्षत माथे पे इसके रोली।।
यह बह रही सुबह की ठंडी हवा की मानिंद
होठों पे खेलती है बन करके ये ऋचाएं
मिट्टी के व्याकरण से इसका करीबी रिश्ता
सुख-दुख में थपथपाती देती हुई दुआएं
टूटे हुओं को जोड़े
रूठे हुओं को मोड़े
हर दिल अजीज़ भाषा हर दिल अजीज़ बोली।
आओ लगाएं अक्षत माथे पे इसके रोली।।
इक वक्त था कि इसने की है मिसाल कायम
इसने सिखाया सबको मिल जुल के साथ रहना
शालीनता से सुनना शालीनता से गुनना
देखो किसी भी भाषा से वैर नहीं रखना
है बांधता खुलापन
इसका धुला-धुला मन
सबको गले लगाती यह ईद हो कि होली।
आओ लगाएं अक्षत माथे पे इसके रोली।
जो संप्रदाय भाषा की राजनीति करते
सदभाव की मशालों को वे बुझा रहे हैं
वे देश की रगों में बारूद भर रहे हैं
अपने ही घर को अपने हाथों जला रहे हैं
उनका धरम न कुछ भी
उनका धरम है गोली
हिंदी को देखिए तो फिर भी कितनी भोली।
आओ लगाएं अक्षत माथे पे इसके रोली।।
यह क्या विडंबना है कैसी नियति की माया
अंग्रेजियत की इस पर अब भी है प्रेत-छाया
बंधक बनी हुई है अपने ही मुल्क में यह
बरसों की साधना में इसने है कुछ न पाया
अब तो ज़रा संभलिये !
मिल-जुल के साथ चलिए !
इस वक्त को बदलिये रखिए अहम की झोली
आओ लगाएं अक्षत माथे पे इसके रोली।
इसका प्रशस्त पथ हो इसका निरभ्र नभ हो
सबके लिए खुला हो इसका उदार ऑंगन
हर शास्त्र के लिए हो इसके हृदय में निष्ठा
मन से वचन से कर्मों से यह नहीं विरत हो
होने न पाए छल बल
टूटे नहीं मनोबल
यह किंवदन्तियों में घुट कर ही रह न जाए।
होने न पाए हिंदी के नाम पर ठिठोली ।
आओ लगाएं अक्षत माथे पे इसके रोली।
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