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लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे : साहिर लुधियानवी

साहिर लुधियानवी
                
                                                         
                            लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
                                                                 
                            
रूह भी होती है उस में ये कहां सोचते हैं

रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं

वहशत का चलन जारी है

रूह मर जाते हैं तो ये जिस्म है चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं

कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज

लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे
वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज
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वहशत का चलन जारी है

8 वर्ष पहले

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