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दिल मेरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला

अकबर इलाहाबादी
                
                                                         
                            -अकबर इलाहाबादी-
                                                                 
                            

दिल मेरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला
बुत के बंदे तो मिले अल्लाह का बंदा न मिला

बज़्म-ए-यारां[1] से फिरी बाद-ए-बहारी[2] मायूस
एक सर भी उसे आमादा-ए-सौदा[3] न मिला

गुल के ख्व़ाहां[4] तो नज़र आए बहुत इत्र फ़रोश
तालिब-ए-ज़मज़म-ए-बुलबुल-ए-शैदा [5] न मिला

वाह क्या राह दिखाई हमें मुर्शिद[6] ने
कर दिया काबे को गुम और कलीसा[7] न मिला

रंग चेहरे का तो कॉलेज ने भी रक्खा क़ाइम
रंग-ए-बातिन[8] में मगर बाप से बेटा न मिला

सय्यद उठे तो गज़ट ले के तो लाखों लाए
शेख़ क़ुरान दिखाता फिरा पैसा न मिला

होशयारों में तो इक इक से सिवा हैं 'अकबर'
मुझ को दीवानों में लेकिन कोई तुझ सा न मिला


1.यारों की महफ़िल 2. वसंत ऋतु की हवा 3. पागलपन के लक्षण दिखाता 4.लालसा करना,इच्छा 5. जो मोहक बुलबुल का गीत चाहता है 6.गाइड,गुरू 7.चर्च 8.आंतरिक रंग,निहित रंग
9 वर्ष पहले

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