स्वरांगी साने
रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा वैश्विक स्तर पर आयोजित किए जा रहे टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव विश्वरंग 2022 के अंतिम दिन ग्लैमर से भरा भी था और संजीदा भी। इसे ग्लैमरस संजीदगी कहा जा सकता है। इस दिन का विशेष आकर्षण रसिका दुग्गल की डॉ. पल्लवी राव चतुर्वेदी से बातचीत थी।
विश्व रंग के अंतिम दिन के सुबह के सत्र ‘नई कहानियों का नया मंच’ में अभिनेत्री रसिका दुग्गल विश्व रंग के दर्शकों से रूबरू हुईं। जब उनसे पूछा गया कि शुरुआत कहाँ से और कैसे हुई तो उन्होंने कहा कि वे फिल्म इंस्टीट्यूट के बारे में पहले ज़्यादा कुछ नहीं जानती थी लेकिन जब दाखिला लिया और कुछ समय बिताया तब उस जगह के बारे में जान पायीं कि वो जगह कितनी अद्भुत है। नए प्लेटफ़ॉर्म के बारे में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि पहले भी शॉर्ट फ़िल्में बन रहीं थीं। फ़िल्म बन कर तैयार हो जाती थी लेकिन उन्हें दर्शकों तक पहुँचाना बहुत मुश्किल होता था। उनका डिस्ट्रीब्यूशन ही नहीं हो पाता था। फ़िल्म बन कर पड़ी रहती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। इतने सारे ओ.टी.टी. प्लेटफ़ॉर्म हो गए हैं। यू ट्यूब भी है। मिलियंस व्यू एक- दो दिन में ही आ जाते हैं। अब फ़िल्मों को दर्शकों तक पहुँचाना बहुत आसान हो गया है। उन्होंने मिर्जापुर और दिल्ली क्राइम के अपने किरदारों पर भी बात की।
उन्होंने दुनिया में अपनी सबसे पसंदीदा जगह कश्मीर को बताया। उन्होंने यह भी कहा कि जब आप किसी जगह बतौर टूरिस्ट जाते हैं तो उन जगहों के भीतरी पहलू आपसे अनछुए रह जाते हैं लेकिन जब शूटिंग करने जाते हैं तो बहुत करीब से उन जगहों को देख पाते हैं वहाँ के लोगों से बातचीत और उन्हें समझने के मौके मिलते हैं। कश्मीर में शूट की गई फ़िल्म हामिद के अनुभव भी उन्होंने शेयर किये। यह भी कहा कि अपने किये हुए काम का असर अगर ख़ुद आप पर नहीं हुआ तो फिर उस काम को करने का कोई मतलब नहीं।
इस दिन का दूसरा आकर्षण ‘भारत का उभरता नया सिनेमा’ विषय पर लेखक, फ़िल्म निर्माता विशाल भारद्वाज से ऐंकर इरफ़ान की बातचीत थी। उन्होंने कहा कम बजट में ओटीटी अच्छा कॉन्टेंट देता है। जब कोई नई चीज़ या तकनीक आती है तो उसमें कई अच्छाइयाँ भी होती हैं और बुराइयाँ भी। मैंने ओटोटी में हमेशा अच्छाइयाँ देखी हैं। बदलाव हर दौर में होते आए हैं। एक दौर आया जब मुंबई में बड़ी-बड़ी रिकॉर्डिंग की जाती थी। जहाँ 50-50 म्यूज़िशियन बैठकर संगीत प्ले कर रहे होते थे। लेकिन कुछ समय के बाद म्यूजिक इंडस्ट्री में बदलाव हुआ और नये संगीतकार इंडस्ट्री में उभरकर आये और आज हमारे संगीत को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली। ओटीटी का आना अच्छा है फ़िल्म में समय की बंदिश है। ओटीटी का सीधा नाता कमर्शियल और इकॉनोमी से है। साथ ही इसमें बजट कम लगता है अच्छा कंटेट मिल रहा है। आज स्मॉल टाउन में वेब सीरीज़ बन रही हैं। इसमें सेंसरशिप नहीं है।
अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि फ़िल्म मकबूल की स्क्रीनिंग के लिए सेंसर ने मुझे बुलाया। वहाँ बैठी एक महिला ने मुझसे कहा कि ऐसी फ़िल्म क्यों बना रहे हो? इससे क्या फ़ायदा होगा। ओटीटी में इन सवालों से नहीं गुज़रना पड़ता है। हाँ, अगर आज़ादी मिल जाती है तो 90 प्रतिशत तो पहले गंदगी ही सामने आएगी लेकिन समय के साथ अच्छे और खूबसूरत विषय ओटीटी पर दिखाई देने लगेंगे। इस सत्र का संचालन विनय उपाध्याय ने किया।
3 वर्ष पहले
कमेंट
कमेंट X