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'कुंवर बेचैन' की हाइकु कविता : रहता मौन, तो ऐ झरने तुझे, देखता कौन? 

डॉ. कुंवर बेचैन
                
                                                         
                            जल चढ़ाया
                                                                 
                            
तो सूर्य ने लौटाए
घने बादल। 

तटों के पास
नौकाएं तो हैं, किन्तु
पाँव कहाँ हैं? 

ज़मीन पर
बच्चों ने लिखा 'घर'
रहे बेघर। 

रहता मौन
तो ऐ झरने तुझे 
देखता कौन? 

चिड़िया उड़ी
किन्तु मैं पिंजरे में
वहीं का वहीं! 

ओ रे कैक्टस 
बहुत चुभ लिया
अब तो बस 

आपका नाम
फिर उसके बाद
पूर्ण विराम! 

- कुंवर बेचैन 

साभार - कविता कोश 
7 वर्ष पहले

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