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सादगी में डूबे जज़्बातों की बेमिसाल किताब है 'हमनशीं'- मधुप मणि 'पिक्कू'

पुस्तक समीक्षा
                
                                                         
                            हमनशीं आनंद कौशल का पहला ग़ज़ल एवं शायरी संग्रह है। इसे पढ़कर पाठकों को सबसे अच्छी बात यह लगेगी कि इसमें ज़्यादातर ग़ज़ल और शायरी सीधे दिल से निकले हुए लगते हैं। भाषा बिल्कुल आसान है, इसलिए हर ग़ज़ल को आसानी से समझ सकते हैं। कहीं भी शब्दों में बनावटीपन नहीं दिखता, बल्कि ऐसा महसूस होता है कि शायर ने हर पढ़ने वालों के जीवन के एहसासों को ही शब्दों में ढाल दिया है।
                                                                 
                            

किताब में मोहब्बत, जुदाई, याद, दर्द और रिश्तों की भावनाओं को बहुत सादगी से लिखा गया है। कई ग़ज़लें ऐसी हैं जो पढ़ते ही मन में उतर जाती हैं और देर तक याद रहती हैं। यह सिर्फ ग़ज़ल की किताब नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बातों का एक खूबसूरत आईना है। शायरी तो ऐसे हैं कि हर महबूब को आशिक और आशिक को महबूब का दीदार करा दे।

हमनशीं में प्रस्तुत ग़ज़लें संवेदनशील मन, सच्ची मोहब्बत और गहरे मानवीय अनुभवों की बेहतरीन अभिव्यक्ति हैं। शायर ने प्रेम, विरह, इंतजार, तन्हाई और उम्मीद जैसे भावनात्मक विषयों को सहज, सरल और प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत किया है। ये ग़ज़लें पाठक के मन में भावनात्मक जुड़ाव पैदा करती हैं और अंत तक अपनी छाप छोड़ती हैं। हालाँकि कई ग़ज़लें अपने आप में मिठास लिए हुए है, पर उसमे एक खास ग़ज़ल है –

अपनी उल्फत के वो नगमात मिले,
मिलना चाहा था मगर बीच में दीवार मिले.....
आ के बैठे ही थे महफिल में, के बेजार उठे,
हमसे पहले भी तो, साकी के तलबगार मिले....
माना दुनिया में है खुदगर्ज-ओ-बेवफा ही नहीं,
माना हर गाम पर इन्सां भी खुद्दार मिले
घर से निकले थे वो दामन को बचाकर अपने
उन पर ही इल्जाम के छीटें सरे बाजार मिले
बाद मुद्दत के यह “कौशल” है होश में आये
गो जिंदगानी में ठोकर ही बार-बार मिले


ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी है। आशिक का अपनी महबूब को अपनी चाहत पेश करने का जो अंदाज है वह जज्बाती बना देता है। उदाहरण के तौर पर—

"ये करम मुझपर तेरी चाहतों का रहा,
कभी ओंस से बुझी प्यास तो कभी दरिया ने भी प्यासा रखा।"
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3 दिन पहले

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