मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच विवाद लगातार चर्चा में है। इस मामले में चुनाव आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में 15 बिंदुओं वाला जवाबी हलफनामा दाखिल कर अपनी प्रक्रिया, निर्णयों और प्रशासनिक व्यवस्था का बचाव किया। आयोग ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर लगाए गए आरोपों को खारिज किया और याचिका के आधार पर भी सवाल उठाए। आयोग का कहना है कि संबंधित याचिका एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है। इस हलफनामे के जरिए चुनाव आयोग ने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया निर्धारित नियमों और आयोग के सामूहिक निर्णयों के अनुसार आगे बढ़ाई गई है।
आयोग ने अपने जवाब में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने हलफनामे को सर्वसम्मति से मंजूरी दी है। आयोग के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित तीन प्रमुख आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी फाइल पर आयुक्तों की टिप्पणियां, सवाल, सुझाव या आपत्तियां अपने आप में आयोग का अंतिम निर्णय नहीं होतीं। आयोग की दलील है कि फाइलें सामान्यतः पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास भेजी जाती हैं। जरूरी परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है और उसे बाद में संबंधित फाइल में दर्ज किया जाता है।
फॉर्म-6 को लेकर उठे विवाद पर चुनाव आयोग ने कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले इस फॉर्म में कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग के मुताबिक, फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान इस्तेमाल किया गया घोषणा-पत्र फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज है। हालांकि, आयोग ने यह स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में घोषणा-पत्र को जिस तरह प्रदर्शित किया गया, उससे यह आभास हो सकता था कि फॉर्म-6 में बदलाव किया गया है। इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए आयोग ने 21 अक्टूबर 2026 से ऑनलाइन आवेदन और घोषणा-पत्र को अलग-अलग हिस्सों में प्रस्तुत करने की व्यवस्था का उल्लेख किया।
आयोग ने आंतरिक कार्य-विभाजन से जुड़े विवाद पर भी अपना पक्ष रखा। उसके अनुसार, 28 जुलाई 2026 को जारी कार्य-विभाजन संबंधी आदेश एक प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारी ने जारी किया था। इसके बाद दोनों चुनाव आयुक्तों ने अगले दिन कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे और 30 जुलाई को उनके संयुक्त निर्देश के बाद संबंधित आदेश लागू नहीं हुआ। आयोग ने इन घटनाओं को आधार बनाकर लगाए गए आरोपों को गलत बताया। इसके अलावा, आयोग ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल समाचार रिपोर्ट के आधार पर लगाए गए आरोपों को न्यायिक निष्कर्ष का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने आयोग की कार्यप्रणाली, निर्णय लेने की प्रक्रिया और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से संबंधित मुद्दे उठाए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इसमें चुनाव आयोग के तर्कों के साथ याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर भी विचार किया जाएगा। फिलहाल, हलफनामे में दिए गए तर्क चुनाव आयोग का पक्ष हैं; इन पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अदालत की सुनवाई और आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।