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कुल्लू दशहरा के दूसरे दिन सुबह-सवेरे गूंजे ढोल-नगाड़े, अस्थाई शिविरों में शुरू हुई पूजा-अर्चना

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के दूसरे दिन भी ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में सुबह-सवेरे देव आस्था का अनूठा नजारा देखने को मिला। देवी-देवताओं के अस्थाई शिविरों में पूजा-अर्चना का दौर शुरू होते ही ढोल-नगाड़ों की गूंज से पूरा मैदान भक्तिमय हो उठा। सुबह करीब पांच से छह बजे के बीच अलग-अलग शिविरों में पूजा-अर्चना शुरू हुई। देव समाज के कारकून अपने-अपने देवी-देवताओं की पूजा में जुटे रहे। यह सिलसिला सुबह साढ़े आठ बजे तक जारी रहा। इस दौरान कारकूनों ने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर सदियों पुरानी देव परंपराओं का निर्वहन किया। ढालपुर मैदान में सुबह से ही पारंपरिक रीति-रिवाजों और देव आस्था का माहौल बना रहा। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच विभिन्न देवी-देवताओं के शिविरों में धार्मिक गतिविधियां जारी रहीं। उत्सव के दूसरे दिन की सुबह ने एक बार फिर कुल्लू की समृद्ध देव संस्कृति और परंपराओं की झलक प्रस्तुत की। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा अपनी विशिष्ट देव परंपराओं के लिए जाना जाता है। उत्सव के दौरान देवी-देवताओं की उपस्थिति और उनसे जुड़ी धार्मिक गतिविधियां इस आयोजन को विशेष पहचान देती हैं। दूसरे दिन सुबह की पूजा-अर्चना भी इसी परंपरा का हिस्सा रही।

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