अमर उजाला ब्यूरो झांसी। जन्म के महज नौ महीने बाद पोलियो ने दायां पैर प्रभावित कर दिया, लेकिन हौसलों को कमजोर नहीं कर सका। शारीरिक चुनौती के बावजूद डॉक्टर बनने का सपना देखा और उसे पूरा भी किया। यह कहानी है कन्नौज जिले के छिबरामऊ की रहने वाली डॉ. शबनम की, जो वर्तमान में झांसी मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग में सीनियर रेजिडेंट तृतीय वर्ष के पद पर कार्यरत हैं। दो प्रयासों में एमबीबीएस की परीक्षा पास कर उन्होंने गोवा मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा की पढ़ाई पूरी की। इस सफर में पिता का साथ और खुद पर अटूट विश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। लोगों के सवालों के बीच पिता ने नहीं छोड़ा बेटी का साथ शबनम बताती हैं कि पढ़ाई के दौरान कई लोग उनके पिता से सवाल करते थे कि वह अपनी बेटी को इतना क्यों पढ़ा रहे हैं। इस पर पिता का एक ही जवाब होता था, 'वह मेरी बेटी है और मैं उसे पढ़ाऊंगा।' समाज की बातों की परवाह किए बिना पिता ने उनकी पढ़ाई को प्राथमिकता दी। कोचिंग सेंटर हो या कोई दूसरी जगह, पिता खुद उन्हें छोड़ने और लेने जाते थे। पढ़ाई से जुड़ी हर जरूरत में उनका साथ दिया। पिता के इसी विश्वास ने शबनम को अपने सपनों की ओर बढ़ने का हौसला दिया। मां के इंतकाल के दिन ही परीक्षा के लिए छोड़ना पड़ा घर शबनम के जीवन का एक बेहद कठिन दौर वह भी था, जब एक परीक्षा से ठीक एक दिन पहले उनकी मां का इंतकाल हो गया। मां के निधन की खबर मिलने पर वह घर पहुंचीं, लेकिन उसी दिन शाम को परीक्षा देने के लिए उन्हें वापस निकलना पड़ा। एक ओर मां को खोने का असहनीय दुख था तो दूसरी ओर परीक्षा की जिम्मेदारी। इस कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। शारीरिक चुनौतियों को कभी नहीं माना अपनी कमजोरी शारीरिक स्थिति के कारण उन्हें कई बार काम करने में अतिरिक्त समय और मेहनत लगती है। कुछ परिस्थितियों में वह अपनी इच्छानुसार गति से काम नहीं कर पातीं। इससे कभी-कभी आत्मविश्वास भी प्रभावित होता था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी क्षमता की सीमा नहीं माना। उनका मानना है कि निरंतर अभ्यास और अनुभव से कार्यक्षमता को बेहतर बनाया जा सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में आगे बढ़ना जारी रखा। हेड मैम के भरोसे ने बढ़ाया आत्मविश्वास शबनम बताती हैं कि संघर्ष के दौरान हेड मैम ने उन्हें काफी प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा था, 'तुम बस अपना काम करती रहो, मदद मैं करूंगी।' उनके ये शब्द शबनम के लिए बड़ी ताकत बने। इससे उन्हें न केवल हिम्मत मिली, बल्कि अपनी जिम्मेदारियां बेहतर ढंग से निभाने का आत्मविश्वास भी बढ़ा। सर्जरी के दौरान भी निभा रहीं जिम्मेदारी सर्जरी के दौरान लंबे समय तक खड़े रहना उनके लिए कभी-कभी चुनौतीपूर्ण होता है। इसके बावजूद वह अपनी जिम्मेदारियां पूरी लगन से निभाती हैं। उनके सहयोगी भी काम के दौरान उनका सहयोग करते हैं। शबनम का कहना है कि चुनौतियां आती हैं, लेकिन उनसे घबराकर अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। डॉ. शबनम का सफर बताता है कि शारीरिक चुनौतियां किसी की योग्यता और सपनों की सीमा तय नहीं कर सकतीं। परिवार का साथ, सही मार्गदर्शन और खुद पर विश्वास हो तो मुश्किल से मुश्किल मंजिल भी हासिल की जा सकती है।