स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध होने के बावजूद छात्रों द्वारा उनका लगातार इस्तेमाल एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। यह आदत छात्रों की पढ़ाई, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रही है। यह समस्या केवल ज्यादा समय तक स्क्रीन देखने की नहीं है, बल्कि बार-बार फोन चेक करने की आदत ज्यादा खतरनाक है। छोटी-छोटी रुकावटें भी छात्रों का ध्यान भटका देती हैं, जिससे वे किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई और प्रदर्शन पर पड़ता है। एम्स के साइकियाट्री विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने बताया कि स्कूलों में बैन होने के बावजूद छात्र फोन का इस्तेमाल करते रहते हैं, क्योंकि उन्हें मनोवैज्ञानिक तौर पर फोन से दूर रहना मुश्किल लगता है। उन्होंने बताया कि फोन लगातार जुड़े रहने का एहसास देते हैं और चिंता कम करते हैं, जिससे उन्हें दूर रखना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों में एकाग्रता की कमी, याददाश्त कमजोर होना और पढ़ाई में गिरावट जैसे लक्षण सामने आ रहे हैं। इसके अलावा, लगातार फोन देखने से मानसिक थकान बढ़ती है और नई चीजें समझने की क्षमता भी कम हो जाती है। कई मामलों में बच्चों में फोन के प्रति निर्भरता भी बढ़ती जा रही है, जिससे उन्हें फोन से दूर रहना मुश्किल लगता है। स्कूल प्रशासन के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है। कई बार छात्र सुरक्षा कारणों से फोन लेकर आते हैं, खासकर दूर-दराज इलाकों से आने वाले बच्चे। ऐसे में स्कूल सीमित उपयोग की अनुमति देते हैं, लेकिन कक्षा के दौरान या ब्रेक में फोन के गलत इस्तेमाल को पूरी तरह रोक पाना आसान नहीं है। बड़ी कक्षाओं में यह समस्या और ज्यादा बढ़ जाती है। डॉ. कुमार ने बताया कि एम्स के बिहेवियरल एडिक्शन क्लिनिक में अब हर महीने ऐसे लगभग 100 मामले आ रहे हैं, जो युवाओं में फोन के गलत इस्तेमाल के बढ़ते चलन की ओर इशारा करते हैं।