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मंदसौर रेप कांड पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता- सहमे स्वप्न

काव्य डेस्क

Viral Kavya
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                                                  काँधे पर टंगा बस्ता
चॉकलेट की बचपनी चाहत
और फिर
बाँबियों-झाड़ियों में से निकलते
वे सांप ,भेड़िये और लकड़बग्घे
मासूम गले पर खूनी पंजे
देह की कुत्सित भूख में
बज़बज़ाते लिज़लिज़ाते कीड़े
कर देते हैं उसके जिस्म को
तार-तार।
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सड़कों पर आवाजें हैं

एक अहसास चीख कर
आर्तनाद में बदलता है
और वह जूझती रही,
चीखती रही,
उसका बचपन टांग दिया गया
बर्बर सभ्यता के सलीबों से
सपने भी सहमे हैं उस
सात साल की बच्ची के।

सड़कों पर आवाजें हैं
फांसी दे दो !
गोली मार दो !
इस धर्म का है !
उस धर्म का है !
कुत्तों, भेड़ियों का
कोई धर्म नहीं होता
साँपों की
कोई जात नहीं होती।

एक यक्ष प्रश्न

एक यक्ष प्रश्न
इन सांपों से इन भेड़ियों से
कैसे बचेंगी बेटियां ?
सत्ता के पास अफ़सोस है
समाधान नहीं।
समाज के पास संस्कारों
के आधान नहीं।
उस बेटी के प्रश्न के उत्तर
इतने आसान नहीं।

- सुशील शर्मा 
8 वर्ष पहले
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