जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है
इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइए
- सऊद उस्मानी
वस्ल को मौक़ूफ़ करना पड़ गया है चंद रोज़
अब मुझे मिलने न आना अब कोई शिकवा नहीं
- अज्ञात
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा
- शहरयार
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कुछ रोज़ नसीर आओ चलो घर में रहा जाए
लोगों को ये शिकवा है कि घर पर नहीं मिलता
- नसीर तुराबी
कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए
रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है
- नासिर काज़मी
अफ़्सोस ये वबा के दिनों की मोहब्बतें
इक दूसरे से हाथ मिलाने से भी गए
- सज्जाद बलूच
इक बला कूकती है गलियों में
सब सिमट कर घरों में बैठ रहें
- मोहम्मद जावेद अनवर
क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों
दूरियों में भी दिलकशी है अभी
- अहमद फ़राज़
ये जो मिलाते फिरते हो तुम हर किसी से हाथ
ऐसा न हो कि धोना पड़े ज़िंदगी से हाथ
- जावेद सबा
घर रहिए कि बाहर है इक रक़्स बलाओं का
इस मौसम-ए-वहशत में नादान निकलते हैं
- फ़रासत रिज़वी
मुमकिन है यही दिल के मिलाने का सबब हो
ये रुत जो हमें हाथ मिलाने नहीं देती
- अरशद जमाल सारिम
मैं वो महरूम-ए-इनायत हूँ कि जिस ने तुझ से
मिलना चाहा तो बिछड़ने की वबा फूट पड़ी
- नईम जर्रार अहमद
जहाँ जो था वहीं रहना था उस को
मगर ये लोग हिजरत कर रहे हैं
- लियाक़त जाफ़री