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Social Distancing Shayari: जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है 

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है 
इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइए 
- सऊद उस्मानी

वस्ल को मौक़ूफ़ करना पड़ गया है चंद रोज़ 
अब मुझे मिलने न आना अब कोई शिकवा नहीं 
- अज्ञात

शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है 
सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा 
- शहरयार
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कुछ रोज़ नसीर आओ चलो घर में रहा जाए 
लोगों को ये शिकवा है कि घर पर नहीं मिलता 
- नसीर तुराबी

कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए 
रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है 
- नासिर काज़मी

अफ़्सोस ये वबा के दिनों की मोहब्बतें 
इक दूसरे से हाथ मिलाने से भी गए 
- सज्जाद बलूच

इक बला कूकती है गलियों में 
सब सिमट कर घरों में बैठ रहें 
- मोहम्मद जावेद अनवर

क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों 
दूरियों में भी दिलकशी है अभी 
- अहमद फ़राज़

ये जो मिलाते फिरते हो तुम हर किसी से हाथ 
ऐसा न हो कि धोना पड़े ज़िंदगी से हाथ 
- जावेद सबा

घर रहिए कि बाहर है इक रक़्स बलाओं का 
इस मौसम-ए-वहशत में नादान निकलते हैं 
- फ़रासत रिज़वी

मुमकिन है यही दिल के मिलाने का सबब हो 
ये रुत जो हमें हाथ मिलाने नहीं देती 
- अरशद जमाल सारिम

मैं वो महरूम-ए-इनायत हूँ कि जिस ने तुझ से 
मिलना चाहा तो बिछड़ने की वबा फूट पड़ी 
- नईम जर्रार अहमद

जहाँ जो था वहीं रहना था उस को 
मगर ये लोग हिजरत कर रहे हैं 
- लियाक़त जाफ़री
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