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Ghar Shayari: मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता 
अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है 
~ अख़्तर सईद ख़ान

मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे 
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे 
~ इफ़्तिख़ार आरिफ़
 
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तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद 
शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो 
~ इरफ़ान सिद्दीक़ी

कोई वीरानी सी वीरानी है 
दश्त को देख के घर याद आया 
~ मिर्ज़ा ग़ालिब

दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ 
घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना 
~ सलीम अहमद

किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से 
हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा 
~ निदा फ़ाज़ली
 

तमाम ख़ाना-ब-दोशों में मुश्तरक है ये बात 
सब अपने अपने घरों को पलट के देखते हैं 
~ इफ़्तिख़ार आरिफ़

भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया 
घर से जब शहर में तन्हाई के डर से निकला 
~ अलीम मसरूर

उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है 
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है 
~ कफ़ील आज़र अमरोहवी

अंदर अंदर खोखले हो जाते हैं घर 
जब दीवारों में पानी भर जाता है 
~ ज़ेब ग़ौरी
 
3 वर्ष पहले
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