ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता
अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है
~ अख़्तर सईद ख़ान
मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे
~ इफ़्तिख़ार आरिफ़
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तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो
~ इरफ़ान सिद्दीक़ी
कोई वीरानी सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया
~ मिर्ज़ा ग़ालिब
दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ
घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना
~ सलीम अहमद
किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा
~ निदा फ़ाज़ली
तमाम ख़ाना-ब-दोशों में मुश्तरक है ये बात
सब अपने अपने घरों को पलट के देखते हैं
~ इफ़्तिख़ार आरिफ़
भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया
घर से जब शहर में तन्हाई के डर से निकला
~ अलीम मसरूर
उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है
~ कफ़ील आज़र अमरोहवी
अंदर अंदर खोखले हो जाते हैं घर
जब दीवारों में पानी भर जाता है
~ ज़ेब ग़ौरी