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Rabindranath Tagore: एक से अधिक देशों के राष्ट्रगान लिखने वाले महाकवि

काव्य डेस्क

Sahitya
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                                                  रबीन्द्रनाथ टैगोर एशिया के पहले कवि हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन्हें कृति 'गीतांजलि' के लिए मिला था। गुरुदेव की उपमा से पहचाने जाने वाले महाकवि साहित्य का वो सबसे ऊंचा सोपान हैं जिसे देखकर आने वाली पीढ़ियां अपनी मंज़िलें तय करती हैं। ठाकुर रबीन्द्रनाथ टैगोर के बारे में हर भारतीय यह जानता होगा कि उन्होंने देश का राष्ट्रगान लिखा है लेकिन बहुत कम ये बात जानते हैं कि उनके लिखे गीत बांग्लादेश और श्रीलंका के भी राष्ट्रगान बने हैं, (श्रीलंका के राष्ट्रगान में उनके द्वारा लिखे गीत के अंश हैं)। उन्होंने अपनी रचनाओं से इन देशों के प्रत्येक नागरिक को एक-स्वर में बांधा। 

7 अगस्त 1861 को कलकत्ता पैदा हुए रबीन्द्रनाथ पिता देवेन्द्रनाथ और मां शारदा की 13वीं संतान थे। बचपन में ही मां का निधन हो गया था। कानून की पढ़ाई करने लंदन विश्वविद्यालय गए लेकिन बिना डिग्री लिए ही स्वदेश लौट आए। मृणालिनी देवी से विवाह का संग भी बहुत अधिक न था, 19 साल के साथ के बाद पत्नी की मौत हो गई। उनके जाने के बाद ठाकुर ने दूसरा विवाह नहीं किया। रबीन्द्रनाथ में बचपन से ही साहित्य संबंधी तमाम गुण थे। उन्होंने अपने जीवन काल में उपन्यास, निबंध, लघु-कथाएं, यात्रा-वृत्तांत, नाटक आदि लिखे। जितना प्रेम लोगों ने उनके गीतों और कविताओं को दिया, उतना ही उनकी कहानियों को भी दिया। गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिन, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा और चोखेरबाली उनकी तमाम प्रसिद्ध किताबों से कुछ के नाम हैं। रबीन्द्रनाथ के साथ ही कला को मिला रबीन्द्र संगीत जिसे सीखने की इच्छा कितने ही संगीत-प्रेमी अपने भीतर रखते हैं। 

जॉर्ज पंचम ने 1915 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया था जिसे 1919 में जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के विरोध में उन्होंने लौटा दिया। 7 अगस्त 1941 को 80 वर्ष में महाकवि का देहांत हुआ। 
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कुछ कविताएं (आया था चुनने को फूल यहाँ वन में)

आया मैं चुनने को फूल यहाँ वन में
जाने था क्या मेरे मन में
यह तो, पर नहीं, फूल चुनना
जानूँ ना मन ने क्या शुरू किया बुनना
जल मेरी आँखों से छलका,
उमड़ उठा कुछ तो इस मन में। 


मूल बांग्ला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

चुप-चुप रहना सखी

चुप-चुप रहना सखी, चुप-चुप हीरहना,
काँटा वो प्रेम का-
छाती में बींध उसे रखना
तुमको है मिली सुधा, मिटी नहीं अब तक
उसकी क्षुधा, भर दोगी उसमें क्या विष !
जलन अरे जिसकी सब बेधेगी मर्म,
उसे खींच बाहर क्यों रखना।

मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल




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