रफ़ी साहब को एक कविता फ़िरोज निज़ामी ने गवाया था लाहौर रेडियो स्टेशन से। इसके बाद रफ़ी साहब की गिनती लाहौर स्टेशन के सम्मानित गायकों में होने लगी थी। उस ज़माने में लाहौर भी फिल्म इंडस्ट्री का मरकज़ हुआ करता था।
उसी इंडस्ट्री की एक फिल्म थी "गुलबालोच" जिसमें रफ़ी साहब को गाने का मौका मिला। फिल्म "गुलबालोच" एक पंजाबी फिल्म थी और रफ़ी साहब के लिए पहला गाना था - "सोणी हीरीए तेरी याद ने बहुत सताया" था। ज़ीनत बेगम के साथ संगीतकार श्याम सुंदर के संगीत निर्देशन में यह उनका पहला दोगाना था।
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नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफ़ी का आखिरी गाना अली सरदार जाफरी द्वारा लिखित फिल्म "हब्बा खातून" के लिए था। गाने के बोल थे -'जिस रात के ख्वाब आए वह रात आई' ।
इस गाने के बाद मोहम्मद रफ़ी साहब नौशाद साहब के गले लिपटकर रो पड़े थे, उन्होंने उनसे कहा था- "नौशाद साहब एक मुद्दत बाद एक अच्छा गीत गाया। आज बहुत सूकून मिला, अब जी चाहता है कि इस भरी पूरी दुनिया को छोड़कर चला जाऊं''।
इस गाने का मुआवजा रफ़ी साहब ने नौशाद साहब के लाख इसरार पर भी नहीं लिया और उसी के अगले दिन नौशाद साहब को ख़बर मिली कि मोहम्मद रफ़ी का इंतेकाल हो गया।
नौशाद साहब बताते हैं कि- " रमजान में उनका इंतेकाल हुआ था और रमजान में भी अलविदा के दिन। बांद्रा की बड़ी मस्जिद में उनकी नमाजे जनाज़ा हुई थी। पूरा ट्रैफिक जाम था, क्या हिंदू, क्या सिख, क्या मुसलमान और क्या इसाई, हर कौम तड़कों पर उतर आई।