हरिशंकर परसाई ने अपने व्यंग्यों के द्वारा मौजूदा व्यवस्था, समाज और सत्ता सभी पर निशाना साधा। यद्यपि उनके व्यंग्य में भी समाज के लिए सकारात्मकता की अलख दिखाई पड़ती है। उनके लिखे कुछ चुनिंदा वक्तव्य यहां पढ़ें।
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चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेनेवाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं।
समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया - हिंदू-मुस्लिम, भाई-भाई!
अश्लील पुस्तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।
हरिशंकर परसाई ने देश-दुनिया का सांसारिक चरित्र अपने व्यंग्य के माध्यम से सबके सामने रखा है। इनसे बड़ा ब्यंग्यकार हिंदी साहित्य में अब तक तो सामने नहीं आया है।
बीमारियाँ बहुत देखी हैं - निमोनिया, कालरा, कैंसर; जिनसे लोग मरते हैं। मगर यह टैक्स की कैसी बीमारी है