समाज में घटित होने वाली किसी भी घटना को अभिनीत कर उसे दर्शकों के सामने संदेश देने के लिए सिनेमा एक सशक्त माध्यम है। इसलिए सिनेमा में महिलाओं पर और उनकी स्थिति पर भी ख़ूब फ़िल्में बनीं और उतने ही गीत भी लिखे गए हैं। ये गीत सिर्फ़ महिला गीतकारों ने ही नहीं लिखे बल्कि पुरुषों ने भी महिलाओं के लिए लिखा है।
फ़िल्म- चक दे इंडिया
गीतकार- जयदीप साहनी
सोचा कहाँ था, ये जो, ये जो हो गया
माना कहाँ था, ये लो, ये लो हो गया
चुटकी कोई काटो, ना हैं, हम तो होश में
क़दमों को थामो, ये हैं उड़ते जोश में
बादल पे पाँव है, या छूटा गाँव है
अब तो भई चल पड़ी, अपनी ये नाव है
बादल पे पाँव है
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ओ री चिरैया, नन्ही सी चिड़िया
अंगना में फिर आजा रे
अँधियारा है घना और लहू से सना,
किरणों के तिनके अम्बर से चुन के
अंगना में फिर आजा रे
हमने तुझपे हजारो सितम हैं किये,
हमने तुझपे जहां भर के ज़ुल्म किये
हमने सोचा नहीं, तू जो उड़ जायेगी
ये ज़मीं तेरे बिन सूनी रह जायेगी,
किसके दम पे सजेगा मेरा अंगना
कोने कोने को बोला ना जो, बोलूंगी वो
हां मैंने जो होना होले होले, हो लूंगी वो
मन का है कोना-कोना पिंक, होना ही था ये होना पिंक
मैंने तो आधा-पौना जीना नहीं
मेरी ज़मीन और आसमान
एंड माय वर्ल्ड गोज़ पिंक
काली सी रीधी में हुई वो क़ैद जी
चांद की वारी हमने गुलेल थी
तारों की चाभी से खुली सिफर सी
सुबह, सुबह, सुबह, सुबह
जुगनी हे… उड़ी हे…
नये नये पर लिए
ओ पिंजरा खोल, ओ पिंजरा खोल ओ
बाबुल प्यारे सजन सखारे
सुन ओ मेरी मैय्या
बोझ नहीं मैं किसी के सर का
ना मझदार में नैय्या
पतवार बनूँगी, लहरों से लडूंगी
अरे मुझे क्या बेचेगा रुपैय्या
हो अरे मुझे क्या बेचेगा रुपैया
कल बाबा की ऊँगली को थामी चली थी
कल बाबा की लाठी भी बन जाऊँगी
अम्मा तेरे घरौंदे की चिड़िया हूँ मैं
दाना लेकर ही वापस घर आऊँगी
जिसकी फितरत में है रत समायी नहीं
जिसको दौलत से ज़्यादा मैं भाई नहीं
ऐसे साजन की मुझको ज़रूरत नहीं
ना कहने का सुन लो मुहूरत यही
अकेली चलूँगी, किस्मत से मिलूँगी
अरे मुझे क्या बेचेगा...
आज से अब से आन मेरी मैं
तुमको ना छूने दूंगी
जान को चाहे छलनी कर दो
मान को ना छूने दूंगी
अब छेड़ के देखो तुम मुझको
मैं तुमको नहीं छोडूंगी