Urdu Poetry: देखी थी एक रात तिरी ज़ुल्फ़ ख़्वाब में

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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देखी थी एक रात तिरी ज़ुल्फ़ ख़्वाब में
फिर जब तलक जिया मैं परेशान ही रहा
- रज़ा अज़ीमाबादी 

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दिल कभी ख़्वाब के पीछे कभी दुनिया की तरफ़
एक ने अज्र दिया एक ने उजरत नहीं दी
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

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बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं
कुछ ख़्वाब मिरे ऐन-जवानी में मरे हैं
- एजाज़ तवक्कल

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उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ
अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई
- साहिर लुधियानवी

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दिल गया रौनक़-ए-हयात गई
ग़म गया सारी काएनात गई
- जिगर मुरादाबादी

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इश्क़ की चोट का कुछ दिल पे असर हो तो सही
दर्द कम हो या ज़ियादा हो मगर हो तो सही
- जलाल लखनवी

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