खुदा जाने, है कौन सा,ये मक़ाम जिंदगी का।
तन्हाई जहां पर बन गयी है,नाम जिंदगी का।।
दरअसल , इसमें कोई मेरा कुसूर है ही नहीं।
हिसाब चाहती है जिंदगी,तमाम जिंदगी का।।
चैन से जीना तो मयस्सर मुझे हुआ ही नहीं।
सब्र ही यूं जिंदगी को, है पैग़ाम जिंदगी का।।
मैं हूं वो मुसाफ़िर , मंज़िल जिसे मिली नहीं।
अब जिंदगी पे है यही, इल्ज़ाम जिंदगी का।।
सहर भी, ख़ामोशियों से रूबरू कराती रही।
सुकूं से बीता नहीं वक्त-ए-शाम जिंदगी का।।
हर जख़्म, ये सोचकर अपना लिया है हमने।
कि मेरी जिंदगी को है, ये ईनाम जिंदगी का।।
क्यूं क़ैद-बाम-ओ-दर हुए हम,पूछ ना हमसे।
ये भी एक राज़ है,मेरी गुमनाम जिंदगी का।।
-यूनुस खान