शुआ-ए-सहर-ओ-वक्त-ए-शाम अच्छा लगता था।
सारी तोहमतें और हर इल्ज़ाम अच्छा लगता था।।
सफ़र की मुश्किलें भी , मुश्किल नहीं लगती थी।
हर मंजिल और वो हर मक़ाम अच्छा लगता था।।
शब-ए-वस्ल के मंज़र , शब-ए-फुर्कत के फसाने।
ज़िक्र-ए-वफा के लम्हे, तमाम अच्छा लगता था।।
-यूनुस खान