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तुम सबसे आंख चुराते हो

VIVEK YADAV

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ संज़ीदा सी शक्ल तुम्हारी
        
                                                    
                            
सुबह शाम ही रहती है
कुछ तो मन में है दौड़ रहा
ये नज़र तुम्हारी कहती है

कुछ किस्सों का अंबार लगाकर
यादों से बतियाते हो
क्यों इंसानी वादों की तुम ये
कठिन ठोकरें खाते हो

दिल में कुछ गहरा दफन किए हो
भावों की गर्मी कहती है
तभी तुम्हरे तेवर में
हल्की सी नर्मी रहती है

क्यों लंबी गहरी और भटकती
सांस तुम्हारी बहती है
मन के खंडहर में लगता है
सरिता कोई बहती है

मन में कोई घाव लिए हो
कहने से कतराते हो
अपने अदने से दिल में तुम
कितने भाव छुपाते हो

कुछ तो है, आंखें कहती हैं
तुम सबसे आंख चुराते हो

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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