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तुम सबसे आंख चुराते हो

                
                                                         
                            कुछ संज़ीदा सी शक्ल तुम्हारी
                                                                 
                            
सुबह शाम ही रहती है
कुछ तो मन में है दौड़ रहा
ये नज़र तुम्हारी कहती है

कुछ किस्सों का अंबार लगाकर
यादों से बतियाते हो
क्यों इंसानी वादों की तुम ये
कठिन ठोकरें खाते हो

दिल में कुछ गहरा दफन किए हो
भावों की गर्मी कहती है
तभी तुम्हरे तेवर में
हल्की सी नर्मी रहती है

क्यों लंबी गहरी और भटकती
सांस तुम्हारी बहती है
मन के खंडहर में लगता है
सरिता कोई बहती है

मन में कोई घाव लिए हो
कहने से कतराते हो
अपने अदने से दिल में तुम
कितने भाव छुपाते हो

कुछ तो है, आंखें कहती हैं
तुम सबसे आंख चुराते हो

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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