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तन और मन

Vivek Arora

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तन अपना, दो गज की काया
        
                                                    
                            
मन में है, त्रिलोक समाया
नियम - संयम, तन को बांधे
मन को कोई , बांध न पाया

तन थकता व थम जाता है
मन ये चैन नहीं पाता है
तन की पीड़ा सबको दिखती
मन छिपकर ही , रो पाता है

तन सज धज श्रृंगार करे है
मन भावों से प्यार करे है
तन की है अपनी सीमाएं
मन में पलती सब इच्छाएं

आहत तन को दुनिया देखे
पीड़ा मन की मन ही जाने
तन के घाव सभी भर जाए
मन टूटा , न जुड़ना जाने

तन , मन के वश हो जाता है
जब मन , बुद्धि वश आता है
तन गिर कर ,फिर उठ जाता है
मन हारा , न जय पाता है

गति को तन की , सब पहचाने
मन का वेग , न कोई जाने
काल क्षीण जब, तन को कर दे
मन की शक्ति , जीवन थामे

तप से तन को खूब तपाया
मन से विषय विकार मिटाया
भोग लोभ से दूर हुआ तन
मन ने तब भक्ति रस पाया

तन है मृत्युलोक का वासी
मन है हर सुख का अभिलाषी
तन को मिट्टी हो जाना है
मन को प्रभु शरण आना है
 
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5 वर्ष पहले
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